नमूना रिपोर्ट · काल्पनिक व्यक्ति
आरव शर्मा की बृहत् कुंडली
सिंह लग्न की बड़ी कुंडली: संपूर्ण कुंडली की पूरी रीडिंग, फिर सभी सोलह वर्ग कुंडलियाँ, तीन दशा पद्धतियाँ, KP नक्षत्र और उप स्वामी, और आपके छत्तीसवें वर्ष का वर्षफल।
- जन्म
- 15 अगस्त 1991, 06:40
- स्थान
- Jaipur, Rajasthan, India
- लग्न
- सिंह
- राशि · नक्षत्र
- तुला · चित्रा 3
लग्न: उगती राशि। दशा: ग्रहों से जुड़ी समय की अवधि। नक्षत्र: चंद्रमा के पथ का एक भाग।
एक नज़र में आपकी कुंडली
आरव, आपका जन्म 15 अगस्त 1991 को गुरुवार की सुबह, सूर्योदय के कुछ ही देर बाद जयपुर में हुआ, जब पूर्व क्षितिज पर सिंह राशि उदय हो रही थी। यह पहला अध्याय उन कुछ तथ्यों को एक साथ रखता है जिनसे आपकी पूरी कुंडली का स्वर तय होता है।
तीन स्तंभ
आपका लग्न सिंह है, 6°18′ पर, मघा नक्षत्र में। सिंह सूर्य की राजसी अग्नि राशि है, इसलिए पूरी कुंडली गरिमा, दृश्यता और दिल से नेतृत्व करने की इच्छा की दृष्टि से पढ़ी जाती है। मघा, सिंहासन और पितरों का नक्षत्र, इसे और गहरा करता है: परिवार, वंश और चीज़ों को सही ढंग से करने का भार आप गहराई से महसूस करते हैं।
आपकी चंद्र राशि तुला है और जन्म नक्षत्र चित्रा, तीसरा चरण। चित्रा का प्रतीक एक चमकता रत्न है और इसके देवता त्वष्टा हैं, दिव्य शिल्पकार। यह एक डिज़ाइनर का मन है: आप चाहते हैं कि चीज़ें, लोग और विचार सुंदरता से एक-दूसरे में बैठें, और केवल काम चल जाने से आप संतुष्ट नहीं होते।
आपका चंद्रमा वर्गोत्तम भी है, यानी जन्म कुंडली और नवांश दोनों में तुला में। शास्त्र वर्गोत्तम ग्रह को विशेष रूप से स्थिर और भरोसेमंद मानते हैं, और चंद्रमा के लिए इसका अर्थ है ऐसा भावनात्मक स्वभाव जो बाहर से दिखने से कहीं अधिक स्थिर है।
आपके जन्म का दिन
आपका जन्म पंचांग, यानी जन्म के क्षण के पाँच अंग, इस प्रकार हैं: गुरुवार, शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि, चित्रा नक्षत्र, शुभ योग और कौलव करण। बढ़ते चंद्रमा के पक्ष में गुरुवार का जन्म, और वह भी “शुभ” नाम के योग में, जीवन की एक कोमल और उत्साहवर्धक शुरुआत है; गुरुवार आपके जन्म दिन को गुरु से जोड़ता है।
सबसे ख़ास बातें
आपके लग्न में चार ग्रह एक साथ हैं: मंगल, बुध, गुरु और शुक्र, सभी सिंह राशि में। यह भरा हुआ, ऊर्जावान लग्न है। लोग आपको देखते हैं, और आपके अपने कर्म, वचन और निर्णय ही आपके जीवन का मुख्य इंजन हैं, भाग्य या दूसरे लोग नहीं।
मंगल आपके योगकारक हैं। सिंह लग्न के लिए मंगल चौथे भाव (केंद्र) और नौवें भाव (त्रिकोण) दोनों के स्वामी हैं, इसलिए ये कुंडली के सबसे मददगार ग्रह हैं।
कई शास्त्रीय योग बनते हैं: केंद्र में गुरु, मंगल और शुक्र के साथ होने से राज योग; धन भावों के स्वामी बुध के भाग्य भावों के स्वामियों के साथ होने से धन योग; और छठे भाव के स्वामी शनि के अपनी ही राशि में छठे भाव में होने से हर्ष योग। मिलकर ये ऐसे व्यक्ति का चित्र बनाते हैं जो मेहनत से ऊपर उठता है, कौशल से कमाता है और विरोध से आगे निकल जाता है।
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: सिंह
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | कर्क | 12 | 28.00° | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 3 | 2.80° | मार्गी |
| मंगल | सिंह | 1 | 25.27° | मार्गी |
| बुध | सिंह | 1 | 9.96° | वक्री · अस्त |
| गुरु | सिंह | 1 | 0.14° | मार्गी · अस्त |
| शुक्र | सिंह | 1 | 10.02° | वक्री |
| शनि | मकर | 6 | 8.39° | वक्री |
| राहु | धनु | 5 | 23.42° | मार्गी |
| केतु | मिथुन | 11 | 23.42° | मार्गी |
आपकी मुख्य भविष्यवाणियाँ
ये आपकी कुंडली में अगले दस वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण अवधियाँ हैं, सबसे प्रबल पहले। हर एक बताती है कब, क्यों और संकेत कितना प्रबल है। ये योजना बनाने के लिए अवसर की अवधियाँ हैं, अटल फल नहीं; आगे के समय वाले अध्याय विस्तार देते हैं।
1. करियर में तरक्की और पहचान · प्रबल
कब: नवंबर 2026 से जनवरी 2027, और फिर नवंबर 2027 से फ़रवरी 2028। क्यों: दोनों अवधियों में गुरु और शनि का दोहरा गोचर आपके दसवें भाव पर पड़ता है; पहली में गुरु का गोचर सिंह, आपके लग्न, में भी है, और दूसरी शनि महादशा खोलती है। पदोन्नति, अधिक दिखने वाली भूमिका या सोच-समझकर नौकरी बदलने के लिए यह दशक की सबसे स्पष्ट अवधि है।
2. लगन और विवाह · प्रबल
कब: जून से अक्टूबर 2027, फिर फ़रवरी 2028 से जनवरी 2030, जिसका शिखर अगस्त से अक्टूबर 2029 और मई से सितंबर 2030 है। क्यों: आपके सातवें भाव के स्वामी शनि की अपनी महादशा और अंतर्दशा अगस्त 2027 से चलती है, और दोहरा गोचर आपके सातवें भाव और उसके स्वामी को छूता है। अविवाहित व्यक्ति के लिए यह दशक की मुख्य विवाह अवधि है; विवाहित के लिए साझा लगन के गहराने का समय।
3. आय और लाभ · प्रबल
कब: अगस्त 2030 से मई 2033 (शनि–बुध), जिसके शिखर अगस्त से अक्टूबर 2032 और मार्च 2033 से मार्च 2034 हैं। क्यों: बुध आपके आय और बचत वाले दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं, और शिखर के महीनों में दोहरा गोचर आपके ग्यारहवें भाव पर पड़ता है। इन वर्षों में अपने कौशल और संपर्कों से कमाई लगातार बढ़ती है।
4. घर, संपत्ति या वाहन · मध्यम
कब: सितंबर 2030 से फ़रवरी 2031, और जून से अक्टूबर 2031। क्यों: दोहरा गोचर आपके घर और संपत्ति वाले चौथे भाव पर पड़ता है, जबकि गुरु का गोचर वृश्चिक, आपके चौथे भाव, में है। ख़रीदने, बनाने या घर बदलने की अच्छी अवधि, काग़ज़ ध्यान से जाँचकर।
5. संतान और रचनात्मक काम · मध्यम
कब: नवंबर 2026 से जनवरी 2027, अक्टूबर के अंत से नवंबर 2027, और अगस्त से अक्टूबर 2032। क्यों: गुरु और शनि का दोहरा गोचर आपके संतान, शिक्षा और सृजन वाले पाँचवें भाव पर पड़ता है। परिवार की योजना, किसी पाठ्यक्रम या रचनात्मक शुरुआत के लिए मददगार समय।
6. यात्रा और विदेश से जुड़ाव · मध्यम
कब: सितंबर 2030 से फ़रवरी 2031, और जुलाई 2034 से अप्रैल 2035। क्यों: दोहरा गोचर आपके विदेश वाले बारहवें भाव पर पड़ता है; जुलाई 2034 से अगस्त 2036 तक शनि का गोचर भी कर्क, आपके बारहवें भाव, में रहता है। लंबी यात्राएँ, विदेशी ग्राहकों के साथ काम या विदेश में लंबा प्रवास अनुकूल हैं।
7. अपनी गति संभालने की अवधि · हल्का
कब: अगस्त 2029 से मई 2032। क्यों: शनि का गोचर वृषभ में है, जो आपके चंद्रमा से आठवाँ है (ढैया), और जनवरी 2030 से जुलाई 2031 तक केतु का गोचर आपके दसवें भाव में है। अधिक काम और ज़िम्मेदारी की अपेक्षा रखें; नींद, व्यायाम और बचत की रक्षा करें। यह मेहनत से कुछ बनाने की अवधि है, हानि की अवधि नहीं।
लग्न: शरीर, स्वभाव और मार्ग
लग्न कुंडली का सबसे निजी बिंदु है। यह आपके शरीर, स्वाभाविक स्वभाव और उस दिशा को बताता है जिसमें आपका जीवन स्वाभाविक रूप से चलता है।
सिंह लग्न
सिंह स्थिर अग्नि राशि है। यह गर्मजोशी, अच्छे काम पर गर्व, उदारता और निजी सम्मान की गहरी भावना देती है। सिंह लग्न के साथ आप स्वाभाविक रूप से ज़िम्मेदारी ले लेते हैं; कमरे में लोग आपकी ओर देखते हैं, तब भी जब आप ऐसा न चाहें। इसका छाया पक्ष है आलोचना के प्रति संवेदनशीलता और मदद माँगने में संकोच, क्योंकि माँगना मान खोने जैसा लग सकता है।
सिंह के आरंभिक अंश मघा में आते हैं, जिसके स्वामी केतु हैं और देवता पितर। आपकी पहचान इससे जुड़ी है कि आप कहाँ से आए हैं। बड़ों का सम्मान, परिवार की परंपराओं को जीवित रखना और कुछ ऐसा बनाना जो आपके बाद भी रहे, ये आपके लिए शौक नहीं, पूर्णता का हिस्सा हैं।
बारहवें भाव में लग्नेश
आपके लग्नेश सूर्य कर्क राशि में 27°59′ पर, आपके बारहवें भाव में, आश्लेषा नक्षत्र के चौथे चरण में हैं। बारहवाँ भाव, व्यय भाव, विदेश, निजी जीवन, नींद, आध्यात्मिक एकांत और खर्च का भाव है। जब लग्नेश यहाँ हों, तो व्यक्ति की जीवन ऊर्जा सुर्ख़ियों से दूर की जगहों और भीतरी अवस्थाओं की ओर बहती है।
व्यवहार में यह अक्सर यात्रा या विदेश से गहरे संबंध, पर्दे के पीछे ऐसा काम जो बाद में सामने आता है, और ऊर्जा लौटाने के लिए नियमित एकांत की ज़रूरत के रूप में दिखता है। सूर्य यहाँ मित्र राशि में हैं, इसलिए यह स्थिति सहज है, तनावपूर्ण नहीं। परंपरा की सलाह सरल है: अपने लिए शांत समय सुरक्षित रखें, और अपना मूल्य केवल सार्वजनिक पहचान से न मापें।
पहले भाव में चार ग्रह
मंगल, बुध, गुरु और शुक्र आपके साथ उदय होते हैं। मंगल जोश, साहस और तेज़ निर्णय देते हैं; बुध हाज़िरजवाबी और समझाने की कला; गुरु विवेक, आशावाद और सिखाने की प्रवृत्ति; शुक्र आकर्षण, रुचि और सुंदर परिवेश का प्रेम। यह समृद्ध मिश्रण है, और किस क्षण किस आवाज़ को सुनना है, यह सीखना आपके जीवन का एक शांत कौशल है।
इन चारों में से बुध और गुरु सूर्य के बहुत पास हैं और अस्त माने जाते हैं। अस्त होने का पारंपरिक अर्थ है कि ग्रह का फल स्वतंत्र रूप से नहीं, आपके अपने अधिकार और पहचान के माध्यम से आता है; इसलिए आपकी बुद्धि और आपके सिद्धांत तब सबसे अच्छे दिखते हैं जब परियोजना की बागडोर आपके हाथ में हो। बुध और शुक्र वक्री भी हैं, जो सोच-विचार का गुण है: आप विचारों और संबंधों पर लौटकर उन्हें निखारते हैं।
नवांश लग्न
नवांश (D9) में, जो भीतरी बल और विवाह की कुंडली है, आपका लग्न वृषभ है। सिंह के अग्निमय, दिखने वाले बाहरी रूप के नीचे एक स्थिर, धैर्यवान और सुख-प्रिय भीतरी स्वभाव है जो सुरक्षा और निष्ठा को महत्व देता है। बहुत-से लोग पहले सिंह से मिलते हैं और बाद में हैरान होते हैं कि भीतर से आप कितने ज़मीन से जुड़े और भरोसेमंद हैं।
चंद्र: मन और भावनाएँ
ज्योतिष में चंद्रमा मन है। इसकी राशि, भाव और नक्षत्र बताते हैं कि आप कैसे महसूस करते हैं, आपको क्या सुकून देता है और दबाव में आप कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।
तीसरे भाव में तुला का चंद्रमा
आपके चंद्रमा तुला राशि में 2°47′ पर, आपके तीसरे भाव, सहज भाव, में हैं। तुला संतुलन, न्याय और संबंधों की राशि है। भावनात्मक रूप से आपको अपने आसपास सामंजस्य चाहिए, और झगड़ा या रूखापन आपको उतना प्रभावित करता है जितना आप आमतौर पर दिखने नहीं देते।
तीसरा भाव साहस, भाई-बहन, संवाद और हाथ व वाणी के कौशल का भाव है। यहाँ चंद्रमा एक चंचल, जिज्ञासु मन देते हैं जो बनाते, लिखते, बोलते या छोटी यात्राएँ करते समय सबसे ख़ुश रहता है। आपका मूड इससे गहराई से जुड़ा है कि आप कुछ रच रहे हैं या नहीं। जब मन उदास हो, तो पारंपरिक उपाय ही व्यावहारिक उपाय है: कोई शिल्प, कोई बातचीत या कोई छोटी यात्रा।
चित्रा, चमकता रत्न
आपके चंद्रमा चित्रा नक्षत्र के तीसरे चरण में हैं। चित्रा के स्वामी मंगल हैं और देवता त्वष्टा, वह दिव्य कारीगर जिन्होंने देवताओं के अस्त्र और आभूषण गढ़े। चित्रा में जन्मे लोगों की आँख रूप, रंग और संरचना को ख़ूब पहचानती है, और कच्चे माल से कुछ पूर्ण और सराहनीय बनाते समय वे सबसे जीवंत महसूस करते हैं।
क्योंकि चित्रा के स्वामी मंगल हैं, और मंगल आपके लग्न में योगकारक हैं, आपकी भावनाएँ और आपका जोश गहराई से जुड़े हैं। जब दिल किसी काम में लगा हो, ऊर्जा अपने आप आती है; जब नहीं, तो छोटे काम भी भारी लगते हैं। इसलिए ऐसा काम चुनना जिसकी आपको सच में परवाह हो, आपके लिए विलासिता नहीं, मन को स्वस्थ रखने का तरीका है।
भावनात्मक स्थिरता
आपका चंद्रमा वर्गोत्तम है, जिसे शास्त्र मन की स्थिरता और विश्वसनीयता के रूप में पढ़ते हैं। केमद्रुम योग भी बनता है, यानी चंद्रमा से दूसरी या बारहवीं राशि में कोई ग्रह नहीं है। अपने आप में यह कभी-कभी अकेलेपन के भाव को बताता है, पर यहाँ यह भंग है: कई ग्रह आपके लग्न से केंद्र में हैं, और शनि चंद्रमा से केंद्र में हैं। पारंपरिक पाठ यही है कि यह कठिनाई लागू नहीं होती।
जीवन की सीख फिर भी जानने लायक है। आप बहुत कुछ अकेले उठा सकते हैं, और आपको ऐसा करना नहीं चाहिए। दो-तीन ऐसे लोग रखें जिनसे आप खुलकर बात कर सकें; मन साफ़ रहेगा।
नौ ग्रह
हर ग्रह का अपना मकसद है। यहाँ बताया गया है कि आपका हर ग्रह कहाँ बैठा है, किन भावों का स्वामी है और आपके जीवन में कैसे व्यक्त होने की संभावना है।
सूर्य
सूर्य कर्क राशि में 27°59′ पर आपके बारहवें भाव में, आश्लेषा के चौथे चरण में, मित्र राशि में हैं। लग्नेश होने के कारण ये आपका ही प्रतिनिधित्व करते हैं: आपकी जीवन शक्ति, आत्मविश्वास और मकसद। बारहवें भाव से सूर्य सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा के बजाय सेवा, अध्ययन, विदेशी संबंधों और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से सबसे अच्छा फल देते हैं। नवांश में सूर्य मीन में जाते हैं, करुणा और भीतरी दृष्टि की राशि, जो इसी बात को पुष्ट करती है: आपका अधिकार तब बढ़ता है जब वह स्वयं से बड़े किसी मकसद की सेवा करे।
चंद्र
चंद्रमा तुला राशि में 2°47′ पर आपके तीसरे भाव में हैं और बारहवें भाव के स्वामी हैं। ये वर्गोत्तम हैं, जिससे मन स्थिर और भरोसेमंद रहता है। चंद्रमा के बारहवें भाव के स्वामी होने और लग्नेश के भी बारहवें भाव में होने से विश्राम, स्वप्न, यात्रा और निजी सोच-विचार आपके भावनात्मक जीवन से गहराई से बुने हुए हैं। अच्छी नींद आपका सबसे महत्वपूर्ण सहारा है।
मंगल
मंगल सिंह राशि में 25°16′ पर आपके पहले भाव में, पूर्वा फाल्गुनी के चौथे चरण में, मित्र राशि में हैं। ये चौथे भाव (घर, संपत्ति, मन की शांति) और नौवें भाव (भाग्य, पिता, गुरुजन, आस्था) के स्वामी हैं, इसलिए योगकारक हैं। लग्न में योगकारक होने से आपकी अपनी पहल ही भाग्य, संपत्ति और गुरुजनों के साथ का द्वार खोलती है। नवांश में मंगल अपनी ही राशि वृश्चिक में हैं, जो इन्हें और बल देता है।
लग्न से मंगल का पहले भाव में होना मांगलिक दोष भी बनाता है। इस पर योग और दोष वाले अध्याय में ठीक से बात की गई है; अभी इतना जानना काफ़ी है कि जो ऊर्जा आपको निर्णायक बनाती है वही अधीर भी बना सकती है, और उसे खेल या शारीरिक काम में लगाना पारंपरिक और बहुत प्रभावी उपाय है।
बुध
बुध सिंह राशि में 9°57′ पर आपके पहले भाव में, मघा के तीसरे चरण में हैं। ये वक्री और अस्त हैं, मित्र राशि में हैं, और दूसरे भाव (वाणी, परिवार, बचत) तथा ग्यारहवें भाव (आय, लाभ, संपर्क) के स्वामी हैं। आपके धन भावों के स्वामी आपके ही लग्न में बैठे हैं, इसलिए आपकी कमाई सीधे आपके कौशल, संवाद और प्रतिष्ठा पर निर्भर है।
वक्री बुध दोबारा सोचते हैं: आप सुधारते हैं, फिर से विचारते हैं, और अक्सर दूसरी बार बेहतर उत्तर पर पहुँचते हैं। अस्त बुध तब सबसे अच्छा काम करते हैं जब विचारों पर आपका नाम हो। नवांश में बुध अपनी ही राशि मिथुन में हैं, इसलिए भीतरी बुद्धि बलवान है, भले ही उसे दिखने में समय लगे।
गुरु
गुरु सिंह राशि में 0°08′ पर आपके पहले भाव में, मघा के पहले चरण में, अस्त और मित्र राशि में हैं। ये पाँचवें भाव (संतान, सृजन, विद्या, पूर्व पुण्य) और आठवें भाव (परिवर्तन, शोध, गुप्त विषय) के स्वामी हैं। लग्न में गुरु कुंडली के क्लासिक आशीर्वादों में से एक है: यह विवेक, रक्षक आशावाद और सलाहकार या शिक्षक की स्वाभाविक भूमिका देता है।
गुरु आपकी वर्तमान महादशा के स्वामी भी हैं, जो अगस्त 2011 से अगस्त 2027 तक चलती है, इसलिए सीखने, बढ़ने और मार्गदर्शन के इनके विषयों ने अब तक आपके पूरे वयस्क जीवन को आकार दिया है। नवांश में गुरु मेष में हैं, एक अग्नि राशि, जो इनकी ऊर्जा को सक्रिय और आगे बढ़ती रखती है।
शुक्र
शुक्र सिंह राशि में 10°01′ पर आपके पहले भाव में, मघा के चौथे चरण में हैं। ये वक्री हैं और स्वाभाविक शत्रु सूर्य की राशि में हैं, तथा तीसरे भाव (साहस, कौशल, भाई-बहन) और दसवें भाव (करियर और पद) के स्वामी हैं। आपके करियर के स्वामी आपके लग्न में बैठे हैं, जो इस बात का प्रबल संकेत है कि आपका बिज़नेस आपके स्वभाव, रुचि और उपस्थिति से गहराई से जुड़ा है।
कठिन राशि में शुक्र आपको सुंदरता और न्याय के मामले में माँग करने वाला बना सकते हैं, कभी-कभी झुँझलाहट तक। वक्री शुक्र संबंधों और रचनात्मक काम पर तब तक लौटते हैं जब तक वे सही न लगें। नवांश में शुक्र कर्क में हैं, एक देखभाल करने वाली जल राशि, जो इन्हें नरम करती है।
शनि
शनि मकर राशि में 8°23′ पर आपके छठे भाव में, उत्तराषाढ़ा के चौथे चरण में हैं। ये अपनी ही राशि में हैं और वक्री हैं, तथा छठे भाव (काम, सेहत की दिनचर्या, प्रतिस्पर्धा) और सातवें भाव (विवाह और साझेदारी) के स्वामी हैं। छठे भाव में अपनी राशि के शनि इनकी सबसे अच्छी स्थितियों में से एक है: यह सहनशक्ति, दैनिक काम में नियम से काम और किसी भी प्रतियोगी से आगे टिके रहने की क्षमता देता है। यही आपका हर्ष योग है।
क्योंकि शनि सातवें भाव के भी स्वामी हैं, आपके जीवन में साझेदारी काम, कर्तव्य और परिपक्वता से जुड़ी है। धीरे-धीरे बढ़ने वाले और साझा मेहनत पर बने संबंध आपको तूफ़ानी रोमांस से कहीं ज़्यादा रास आते हैं। शनि की महादशा अगस्त 2027 में शुरू होती है, इसलिए ये गुण अगले उन्नीस वर्षों में केंद्र में होंगे।
राहु और केतु
राहु धनु राशि में 23°25′ पर आपके पाँचवें भाव में, पूर्वाषाढ़ा के चौथे चरण में हैं, और केतु ठीक सामने मिथुन में 23°25′ पर आपके ग्यारहवें भाव में, पुनर्वसु के दूसरे चरण में हैं। पाँचवें भाव में राहु अनोखी विद्या, रचनात्मक प्रयोगों और दूसरी संस्कृतियों के विचारों की भूख लाते हैं, और कभी-कभी सट्टे जैसे जोखिमों के प्रति बेचैनी भी। ग्यारहवें भाव में केतु भीड़, पद और बड़े नेटवर्क के प्रति एक तटस्थ दृष्टि देते हैं: आप बहुत-से परिचितों के बजाय कुछ सच्ची दोस्तियों को महत्व देते हैं।
मिलकर ये बताते हैं कि आपका विकास रचनात्मक बात रखने की कला और मौलिक सोच में है (पाँचवें भाव में राहु), जबकि समूहों के भीतर काम करना आप लगभग स्वाभाविक रूप से पहले से जानते हैं (ग्यारहवें भाव में केतु)।
बारह भाव
हर भाव जीवन का एक विभाग है। हर भाव के लिए हम उसकी राशि, उसके स्वामी की स्थिति, उसमें बैठे ग्रह और उसका सर्वाष्टकवर्ग अंक देते हैं। 28 या अधिक पारंपरिक रूप से बलवान है, और 25 से कम अंक अधिक सचेत ध्यान माँगते हैं। आपका कुल 337 है, जो शास्त्रीय रूप से निश्चित कुल है।
पहले से चौथे भाव तक
पहला भाव, तनु (सिंह, अंक 30)। स्वामी सूर्य बारहवें भाव में; इसमें मंगल, बुध, गुरु और शुक्र हैं। एक बलवान, व्यस्त भाव: सेहत, आत्मविश्वास और निजी प्रयास आपकी नींव हैं।
दूसरा भाव, धन (कन्या, अंक 21)। इसके स्वामी बुध पहले भाव में हैं। कम अंक बचत और घर में तीखे शब्दों के प्रति सावधानी माँगता है; स्वामी लग्न में होने से कमाई अच्छी है, पर धन टिकाने के लिए स्वचालित बचत जैसी सोची-समझी आदत चाहिए।
तीसरा भाव, सहज (तुला, अंक 26)। इसके स्वामी शुक्र पहले भाव में हैं; इसमें चंद्रमा हैं। साहस, सृजन और संवाद आपके लिए भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हैं, और भाई-बहन या क़रीबी सहकर्मी आपकी कहानी में सच्ची भूमिका निभाते हैं।
चौथा भाव, सुख (वृश्चिक, अंक 27)। इसके स्वामी योगकारक मंगल पहले भाव में हैं। घर और संपत्ति आपकी अपनी पहल से आते हैं; आप विरासत में पाने के बजाय अपना घर स्वयं बनाने या ख़रीदने की अधिक संभावना रखते हैं।
पाँचवें से आठवें भाव तक
पाँचवाँ भाव, पुत्र (धनु, अंक 27)। इसके स्वामी गुरु पहले भाव में हैं; इसमें राहु हैं। सृजन, पढ़ाई और संतान आपकी अपनी पहचान से गहराई से जुड़े हैं। राहु मौलिकता और अपरंपरागत विषयों में रुचि जोड़ते हैं; साथ ही जुए जैसे जोखिमों से सावधानी भी माँगते हैं।
छठा भाव, रिपु (मकर, अंक 32)। इसके स्वामी शनि अपनी ही राशि में इसी भाव में हैं। आपके सबसे बलवान भावों में से एक: काम, सेवा और बाधाओं पर विजय की उत्कृष्ट क्षमता। दिनचर्या आपकी साथी है।
सातवाँ भाव, कलत्र (कुंभ, अंक 19)। इसके स्वामी शनि छठे भाव में हैं। आपकी कुंडली का सबसे कम अंक, जो धैर्य माँगने वाले भाव के लिए आम है। साझेदारी समय, साझा काम और यथार्थवादी अपेक्षाओं के साथ बेहतर होती है, जैसा प्रेम वाला अध्याय बताता है।
आठवाँ भाव, आयु (मीन, अंक 27)। इसके स्वामी गुरु पहले भाव में हैं। एक संतुलित भाव, जो शोध, दृढ़ता और परिवर्तन के साथ स्वस्थ संबंध को सहारा देता है।
नौवें से बारहवें भाव तक
नौवाँ भाव, धर्म (मेष, अंक 28)। इसके स्वामी योगकारक मंगल पहले भाव में हैं। भाग्य कर्म के पीछे चलता है; गुरुजन, आपके पिता और आपके अपने सिद्धांत बड़े सहारे हैं।
दसवाँ भाव, कर्म (वृषभ, अंक 37)। इसके स्वामी शुक्र पहले भाव में हैं। बहुत बलवान करियर भाव। पारंपरिक रूप से ऐसा काम संकेतित है जिसमें आपकी रुचि, उपस्थिति और संबंध मायने रखें, और पहचान लगातार बढ़ती है।
ग्यारहवाँ भाव, लाभ (मिथुन, अंक 41)। इसके स्वामी बुध पहले भाव में हैं; इसमें केतु हैं। आपका सबसे ऊँचा अंक: लाभ, आय और इच्छाओं की पूर्ति को प्रबल सहारा है, विशेषकर आपके अपने कौशल और कुछ सच्चे संपर्कों के माध्यम से।
बारहवाँ भाव, व्यय (कर्क, अंक 22)। इसके स्वामी चंद्रमा तीसरे भाव में हैं; इसमें सूर्य हैं। खर्च और घर से दूर बिताए समय पर ध्यान चाहिए, और विश्राम अनमोल है। विदेशी संबंध और आध्यात्मिक साधना यहाँ अर्थपूर्ण हैं।
भाव अनुसार सर्वाष्टकवर्ग
योग और दोष
योग ग्रहों के शास्त्रीय संयोग हैं; दोष वे संयोग हैं जो सावधानी माँगते हैं। यहाँ हर वह योग है जो iAstroGuru Engine ने आपकी कुंडली में पाया, उसके पारंपरिक अर्थ के साथ।
योगकारक मंगल
सिंह लग्न के लिए मंगल चौथे और नौवें भाव के स्वामी हैं, यानी केंद्र और त्रिकोण दोनों के, जो इन्हें योगकारक बनाता है। आपके ही लग्न में होने से ये साहस, पहल और आपके प्रयास व भाग्य के बीच सीधा संबंध देते हैं। जिन वर्षों और परियोजनाओं में आप साहस और शारीरिक ऊर्जा से काम करते हैं, वे अक्सर सबसे भाग्यशाली होते हैं।
राज योग
गुरु (पाँचवें भाव, त्रिकोण, के स्वामी), मंगल (चौथे और नौवें के स्वामी) और शुक्र (दसवें भाव, केंद्र, के स्वामी) आपके पहले भाव में एक साथ हैं। केंद्र और त्रिकोण के स्वामियों का मिलन क्लासिक राज योग है, जो पारंपरिक रूप से बढ़ते पद, सम्मान और नेतृत्व से जुड़ा है। लग्न में ही बनने के कारण यह आपके स्वभाव और निर्णयों के माध्यम से काम करता है।
धन योग
आपके धन भावों, दूसरे और ग्यारहवें, के स्वामी बुध, भाग्य भावों पाँचवें और नौवें के स्वामी गुरु और मंगल के साथ हैं। यह धन योग है, जो पारंपरिक रूप से कमाने और साधन बनाने की क्षमता से जुड़ा है। ग्यारहवें भाव के 41 अंकों के साथ लाभ की संभावना स्पष्ट है; दूसरे भाव का कम अंक सोच-समझकर बचत करने की याद दिलाता है।
हर्ष योग
छठे भाव के स्वामी शनि अपनी ही राशि में छठे भाव में हैं। यह हर्ष योग है, तीन विपरीत राज योगों में से एक, जो पारंपरिक रूप से अच्छे सेहत, निर्भयता और विरोधियों पर विजय से जुड़ा है। यह उस व्यक्ति की कुंडली है जो माँग वाले, प्रतिस्पर्धी माहौल में अच्छा करता है।
केमद्रुम योग, भंग
आपके चंद्रमा से दूसरी या बारहवीं राशि में कोई ग्रह नहीं है, जिससे तकनीकी रूप से केमद्रुम योग बनता है। यह भंग है क्योंकि ग्रह आपके लग्न से केंद्र में हैं, और शनि चंद्रमा से केंद्र में हैं। इस तरह भंग होने पर शास्त्र इसके प्रभाव नहीं मानते।
मांगलिक दोष
लग्न से गिनने पर मंगल आपके पहले भाव में हैं, जिससे लग्न से मांगलिक दोष बनता है। चंद्रमा से गिनने पर मंगल ग्यारहवें भाव में हैं, जहाँ दोष नहीं है। अधिकांश परंपराओं में केवल एक आधार से बना दोष हल्का माना जाता है।
मांगलिक दोष बहुत आम है और यह मिलान का विचार है, किसी व्यक्ति पर निर्णय नहीं। पारंपरिक रूप से जब दोनों साथी मांगलिक हों तो यह संतुलित हो जाता है, और कई अन्य स्थितियाँ इसे भंग कर सकती हैं। समय आने पर केवल नाम पर भरोसा करने के बजाय दोनों कुंडलियों का ठीक से मिलान करें।
काल सर्प
आपकी कुंडली में काल सर्प नहीं बनता: ग्रह राहु–केतु अक्ष के दोनों ओर हैं।
ग्यारहों दोषों की जाँच
ग्यारह दोष जाँचों में मंगल दोष केवल लग्न से, हल्के रूप में है, और केमद्रुम भंग है। काल सर्प, पितृ, ग्रहण, गुरु चांडाल, शापित, अंगारक, विष और गंडमूल दोष नहीं हैं, और अभी साढ़े साती या ढैया नहीं चल रही।
प्रेम और विवाह
संबंध सातवें भाव और उसके स्वामी से, शुक्र से, और नवांश से पढ़े जाते हैं, जिसे पराशर ने विवाह के लिए समर्पित किया है।
सातवाँ भाव
आपका सातवाँ भाव कुंभ है, मित्रता, स्वतंत्रता और साझा आदर्शों की वायु राशि। आप ऐसे साथी की ओर आकर्षित होते हैं जो बुद्धिमान हो, थोड़ा अलग हो और सच्चा मित्र भी हो, जिसका अपना जीवन और अपनी राय हो। इसके स्वामी शनि अपनी राशि में आपके छठे भाव में हैं।
जब सप्तमेश काम और सेवा के भाव में हों, तो साझेदारी साझा प्रयास और दैनिक दिनचर्या से जुड़ जाती है। आपके जीवन में संबंध साथ मिलकर कुछ करने से गहरे होते हैं: घर, बिज़नेस या परिवार की दिनचर्या बनाना। शनि का प्रभाव धैर्य की सलाह भी देता है; जीवन स्थिर लगने के बाद किए गए वादे इस स्थिति के लिए पारंपरिक रूप से अधिक टिकाऊ होते हैं।
शुक्र और नवांश
प्रेम के कारक शुक्र आपके लग्न में वक्री हैं: आप प्रेम में सुंदरता, निष्ठा और न्याय की गहरी परवाह करते हैं, और महत्वपूर्ण संबंधों को आसानी से जाने देने के बजाय उन पर लौटते हैं। नवांश में शुक्र कर्क में हैं, एक पोषण करने वाली राशि, और आपका नवांश लग्न वृषभ है, जिसके स्वामी स्वयं शुक्र हैं। सिंह के अभिमान के नीचे एक ऐसा साथी है जो सुरक्षा, स्नेह और आरामदायक घर चाहता है।
नवांश में मंगल अपनी राशि वृश्चिक में राहु के साथ हैं। निकट संबंधों में जुनून और तीव्रता प्रबल है; शुरुआत में ही अपेक्षाओं पर ईमानदार बातचीत पारंपरिक सुरक्षा है।
क्या मददगार है
आपका तुला का चंद्रमा न्याय और कोमलता चाहता है, और सिंह लग्न सराहना चाहता है। व्यवहार में संबंध तब सबसे अच्छे चलते हैं जब आप यह उम्मीद करने के बजाय कि साथी स्वयं समझ जाए, साफ़ कहें कि आपको क्या चाहिए, और जब आप दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जगह रखें, जो सातवें भाव का कुंभ माँगता है। साथ मिलकर छोटे, नियमित अनुष्ठान, जैसे साझा सैर, भोजन या साप्ताहिक योजना, बड़े दिखावे से ज़्यादा सप्तमेश शनि को रास आते हैं।
काम, धन और मकसद
करियर दसवें भाव और उसके स्वामी से, दशमांश (D10) से, और धन भावों दूसरे व ग्यारहवें से पढ़ा जाता है।
दसवाँ भाव
आपका दसवाँ भाव वृषभ है, 37 सर्वाष्टकवर्ग अंकों के साथ, आपकी कुंडली का दूसरा सबसे ऊँचा अंक। वृषभ मूल्य, सुंदरता, स्थिरता और साधनों की राशि है। इसके स्वामी शुक्र आपके लग्न में हैं, जो आपके बिज़नेस को सीधे आपके स्वभाव और रुचि से जोड़ता है।
पारंपरिक रूप से यह ऐसे काम की ओर संकेत करता है जहाँ प्रस्तुति, डिज़ाइन, संबंध, वित्त, आतिथ्य, कला या विलासिता मायने रखे, या कोई भी क्षेत्र जहाँ आपकी निजी उपस्थिति और निर्णय ही उत्पाद हों। स्वामी वक्री होने से ऐसे करियर विशेष रूप से अनुकूल हैं जिनमें किसी चीज़ को निखारना, पुनर्स्थापित करना या नया रूप देना हो।
दशमांश (D10)
आपकी दशमांश कुंडली, जो करियर की वर्ग कुंडली है, में लग्न तुला है और चंद्रमा उसी में हैं। लोगों से जुड़ा काम, बातचीत और कूटनीति व संतुलन वाला हर काम उभरता है। दशमांश के सातवें भाव में मंगल अपनी राशि मेष में हैं, जो साझेदारी, ग्राहकों और सौदे करने को सहारा देता है। दशमांश के ग्यारहवें भाव में गुरु सिंह में हैं, जो आपके बिज़नेस से जुड़े नेटवर्क से लाभ और पहचान का क्लासिक समर्थन है।
धन
बुध आपके दूसरे और ग्यारहवें दोनों भावों के स्वामी हैं और गुरु व मंगल के साथ आपके लग्न में बैठकर पहले बताया गया धन योग बनाते हैं। सर्वाष्टकवर्ग में ग्यारहवें भाव के 41 अंक हैं, आपके सबसे ऊँचे, जबकि दूसरे भाव के 21। व्यावहारिक पाठ स्पष्ट है: आप अपने कौशल से अच्छा कमाने की संभावना रखते हैं, पर बचत सोच-समझकर करनी होगी। अच्छे इरादों की तुलना में लंबी अवधि की बचत में स्वचालित हस्तांतरण इस कुंडली के लिए कहीं बेहतर है।
मकसद
छठे भाव में बलवान शनि और बारहवें में सूर्य के साथ, आपकी सबसे गहरी संतुष्टि उपयोगी और अच्छे से किए गए काम से आती है, जिसमें अक्सर सेवा या पर्दे के पीछे का तत्व होता है, और ऐसे योगदान से जो टिके। सिंह के लिए पद मायने रखता है, पर इस कुंडली में अर्थ उससे भी अधिक।
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: तुला
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | धनु | 3 | — | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 1 | — | मार्गी |
| मंगल | मेष | 7 | — | मार्गी |
| बुध | वृश्चिक | 2 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 11 | — | मार्गी |
| शुक्र | वृश्चिक | 2 | — | वक्री |
| शनि | वृश्चिक | 2 | — | वक्री |
| राहु | कर्क | 10 | — | मार्गी |
| केतु | मकर | 4 | — | मार्गी |
आपके जीवन के अध्याय
विंशोत्तरी दशा जीवन को बारी-बारी से हर ग्रह द्वारा शासित अवधियों में बाँटती है, जो आपके जन्म नक्षत्र के स्वामी से शुरू होती हैं। आपका जन्म चित्रा में हुआ, जिसके स्वामी मंगल हैं, इसलिए जीवन मंगल की एक छोटी दशा से शुरू हुआ।
अभी आप कहाँ हैं
आप गुरु महादशा के अंतिम भाग में हैं, जो 26 अगस्त 2011 से 26 अगस्त 2027 तक है। गुरु आपके लग्न में हैं और पाँचवें व आठवें भाव के स्वामी हैं, इसलिए ये सोलह वर्ष सीखने, बढ़ने, सृजन और बड़े निजी परिवर्तन के रहे हैं।
इसके भीतर अभी राहु की अंतर्दशा चल रही है, 1 अप्रैल 2025 से 26 अगस्त 2027 तक। राहु आपके पाँचवें भाव में हैं, इसलिए यह अंतिम उप-अवधि पढ़ाई, रचनात्मक काम या नए उपक्रमों में असामान्य अवसर लाती है, साथ ही कुछ अलग करने की बेचैन इच्छा भी। यह प्रयोग करने का अच्छा समय है, और बड़े सट्टेबाज़ी वाले दाँव के लिए कम अच्छा।
गुरु के वर्ष, पीछे मुड़कर
अध्याय की शुरुआत गुरु की अपनी अंतर्दशा से हुई (अगस्त 2011 से अक्टूबर 2013), फिर शनि (अप्रैल 2016 तक), बुध (अगस्त 2018 तक), केतु (जुलाई 2019 तक), शुक्र (मार्च 2022 तक), सूर्य (दिसंबर 2022 तक), चंद्र (अप्रैल 2024 तक) और मंगल (अप्रैल 2025 तक)। पीछे देखें तो 2019 से 2022 के शुक्र के वर्ष, जब दसवें भाव के स्वामी आपके लग्न में सक्रिय थे, करियर और संबंधों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे होंगे।
शनि महादशा, 2027 से 2046
26 अगस्त 2027 को आप शनि की महादशा में प्रवेश करते हैं, उन्नीस वर्ष शनि के शासन में। शनि अपनी राशि में आपके छठे भाव में हैं, छठे और सातवें के स्वामी हैं और हर्ष योग बनाते हैं। यह काम, सेवा, सेहत के नियम से काम और दीर्घकालिक साझेदारी के लिए एक बलवान, उत्पादक दशा है। फल धीरे-धीरे आते हैं, और टिकते हैं।
इसकी अंतर्दशाएँ हैं: शनि (अगस्त 2027 से अगस्त 2030), बुध (मई 2033 तक), केतु (जून 2034 तक), शुक्र (अगस्त 2037 तक), सूर्य (जुलाई 2038 तक), चंद्र (फ़रवरी 2040 तक), मंगल (अप्रैल 2041 तक), राहु (फ़रवरी 2044 तक) और गुरु (अगस्त 2046 तक)। शुरुआती शनि–शनि के वर्ष स्वर तय करते हैं: तब बनाए गए वादे, ज़िम्मेदारियाँ और ढाँचे अक्सर दो दशक तक साथ चलते हैं। उसके बाद की बुध अंतर्दशा आपके धन भावों के स्वामी को सक्रिय करती है और पारंपरिक रूप से आय के लिए अच्छी है।
और आगे
शनि के बाद 2046 से 2063 तक बुध की महादशा आती है, जिनके स्वामी धन भाव हैं और जो आपके लग्न में बैठे हैं, फिर 2063 से 2070 तक केतु और 2070 से शुक्र। आपकी कुंडली का लंबा चाप सीखने (गुरु) से, प्रयास और निर्माण (शनि) होते हुए, कौशल और प्रतिष्ठा के फल पाने (बुध) तक जाता है।
विंशोत्तरी महादशाएँ
- मंगल1991–1993
- राहु1993–2011
- गुरु2011–2027
- शनि2027–2046
- बुध2046–2063
- केतु2063–2070
- शुक्र2070–2090
- सूर्य2090–2096
- चंद्र2096–2106
आज का आकाश
गोचर बताता है कि चलते ग्रह आपकी जन्म कुंडली को कैसे छूते हैं। 29 सितंबर 2026 को धीमे ग्रह आपके लिए यह कर रहे हैं।
शनि
शनि का गोचर 3 जून 2027 तक मीन में है, जो लग्न से आपका आठवाँ और चंद्रमा से छठा भाव है। चंद्रमा से छठा भाव पारंपरिक रूप से शनि के गोचर की सबसे अच्छी स्थितियों में से एक है, जो काम, सेहत की दिनचर्या और बाधाओं पर विजय को अनुकूल बनाता है। लग्न से आठवाँ भाव परिवर्तन और गुप्त विषयों में सावधानी माँगता है। इसके बाद गोचर में शनि मेष, आपके नौवें भाव, में प्रवेश करते हैं, अक्टूबर 2027 से फ़रवरी 2028 तक थोड़े समय के लिए मीन में लौटते हैं, और 23 फ़रवरी 2028 से मेष में स्थिर होते हैं।
आप साढ़े साती में नहीं हैं। आपकी पिछली ढैया (चंद्रमा से चौथे भाव में शनि) जनवरी 2020 से जनवरी 2023 तक थी। अगली ढैया, चंद्रमा से आठवें भाव में शनि, अगस्त 2029 से मई 2032 तक अपेक्षित है, और साढ़े साती अक्टूबर 2038 से दिसंबर 2046 तक। यह अभी बहुत वर्ष दूर है, और तब तक शनि महादशा का पूरा अनुभव आपके साथ होगा।
गुरु
गुरु का गोचर 31 अक्टूबर 2026 तक कर्क, आपके बारहवें भाव, में है, फिर सिंह, आपके ही लग्न और चंद्रमा से ग्यारहवें भाव, में प्रवेश होता है। गुरु 25 जून 2027 तक कर्क और सिंह के बीच आते-जाते हैं और फिर 26 नवंबर 2027 तक सिंह में रहते हैं। लग्न पर और चंद्रमा से ग्यारहवें भाव में गुरु का गोचर पारंपरिक रूप से इसकी सबसे स्वागत योग्य स्थितियों में है: आशावाद, दृश्यता, गुरुजनों का साथ और नेटवर्क से लाभ।
राहु और केतु
राहु का गोचर 5 दिसंबर 2026 तक कुंभ, आपके सातवें भाव, में है, फिर 23 जून 2028 तक मकर, आपके छठे भाव, में। छठे भाव में राहु प्रतिस्पर्धा, समस्या-समाधान और काम के लिए क्लासिक मददगार गोचर है। जून 2028 से यह धनु में लौटता है, वही राशि जिसमें यह आपके जन्म के समय था, जो पारंपरिक रूप से महत्वाकांक्षाओं के नए चक्र से जुड़ा है।
आपके अगले 10 वर्ष
अक्टूबर 2026 से सितंबर 2036 तक वर्ष-दर-वर्ष: चल रही दशा, धीमे ग्रह आपके भावों (सिंह लग्न से गिने गए) में कहाँ से गुज़रते हैं, और हर वर्ष किस काम के लिए सबसे अच्छा है। प्रबलता प्रबल, मध्यम या हल्का के रूप में दी गई है।
अक्टूबर से दिसंबर 2026
आप गुरु महादशा में राहु अंतर्दशा में हैं। 31 अक्टूबर 2026 को गुरु सिंह, आपके लग्न, में प्रवेश करते हैं, और 5 दिसंबर 2026 को राहु आपके सातवें भाव से मकर, आपके छठे भाव, में जाता है। शनि का गोचर मीन, आपके आठवें भाव, में बना रहता है।
नवंबर 2026 से जनवरी 2027 तक गुरु और शनि का दोहरा गोचर आपके दसवें, दूसरे और पाँचवें भाव पर एक साथ पड़ता है: काम में पहचान और अच्छी कमाई वाला अवसर (प्रबल), और किसी रचनात्मक काम या परिवार की योजना के लिए अच्छी अवधि (मध्यम)। छठे भाव में राहु प्रतिस्पर्धा और रुके काम निपटाने में मददगार है (मध्यम)।
2027
राहु अंतर्दशा 26 अगस्त 2027 को समाप्त होती है और शनि महादशा शुरू होती है, शनि–शनि से। पूरा वर्ष दशा संधि है, यानी दो बड़ी अवधियों के बीच का बदलाव, इसलिए बड़ी नई प्रतिबद्धताएँ शुरू करने से पहले वह पूरा करें जो गुरु ने शुरू कराया था।
जनवरी से जून 2027 तक गुरु कर्क, आपके बारहवें भाव, में लौटते हैं: शांत, भीतर की ओर का समय, यात्रा या परिवार पर अधिक ख़र्च (हल्का)। 3 जून 2027 को शनि मेष, आपके नौवें भाव, में जाते हैं, और 25 जून 2027 को गुरु फिर आपके लग्न में आते हैं।
जून से अक्टूबर 2027 तक दोहरा गोचर आपके नौवें, ग्यारहवें और सातवें भाव को छूता है: गुरुजनों का साथ, लंबी दूरी की यात्रा और रिश्ते पर गंभीर बातचीत (प्रबल)। नवंबर 2027 से फ़रवरी 2028 तक यह सीधे आपके दसवें भाव पर पड़ता है: पूरी ज़िम्मेदारी के साथ करियर में एक कदम (प्रबल)।
2028
पूरे वर्ष शनि–शनि चलती है। 23 फ़रवरी 2028 से शनि मेष, आपके नौवें भाव, में स्थिर होते हैं, और 23 जून 2028 को राहु धनु, आपके पाँचवें भाव, में लौटता है, वही राशि जिसमें वह आपके जन्म के समय था।
फ़रवरी 2028 से जनवरी 2030 तक सप्तमेश की अपनी दशा में दोहरा गोचर आपके सातवें भाव और उसके स्वामी को छूता है: दशक की मुख्य विवाह या साझेदारी अवधि (प्रबल)। जुलाई से दिसंबर 2028 तक यह आपके छठे भाव पर पड़ता है: प्रतियोगी परीक्षाएँ, ऋण चुकाना और सेहत की नई दिनचर्या अनुकूल (मध्यम)। राहु की वापसी नई महत्वाकांक्षा या नई पढ़ाई लाती है (मध्यम)।
2029
शनि–शनि जारी है। वर्ष भर गुरु तुला, आपके तीसरे भाव, और कन्या, आपके दूसरे भाव, के बीच आते-जाते हैं, और अगस्त से अक्टूबर 2029 तक शनि वृषभ, आपके दसवें भाव, को छूते हैं।
दिसंबर 2028 से मार्च 2029 तक, और फिर अक्टूबर 2029 से जनवरी 2030 तक, दोहरा गोचर आपके ग्यारहवें भाव पर पड़ता है: लाभ, बोनस या संपर्कों से साथ (प्रबल)। अगस्त से अक्टूबर 2029 तक यह सीधे आपके सातवें भाव पर पड़ता है, लगन के लिए दशक के सबसे प्रबल सप्ताह (प्रबल)। अगस्त 2029 में चंद्रमा से शनि की ढैया शुरू होती है: काम का बोझ यथार्थ के अनुसार तय करें (हल्का)।
2030
29 अगस्त 2030 को शनि–शनि समाप्त होकर शनि–बुध शुरू होती है। 10 जनवरी 2030 को राहु वृश्चिक, आपके चौथे भाव, में और केतु वृषभ, आपके दसवें भाव, में जाते हैं। 17 अप्रैल 2030 से शनि का गोचर वृषभ, आपके दसवें भाव, में है।
मई से सितंबर 2030 तक दोहरा गोचर फिर आपके सातवें भाव पर है: विवाह या बिज़नेस से जुड़े साझेदारी की दूसरी प्रबल अवधि (प्रबल)। सितंबर 2030 से यह आपके चौथे, दसवें और बारहवें भाव पर जाता है: घर ख़रीदना या सुधारना (मध्यम), और काम पर अधिक ज़िम्मेदारी, आसपास पुनर्गठन के साथ (मध्यम)। केतु के इस वर्ष में आवेश में इस्तीफ़ा न दें।
2031
पूरे वर्ष शनि–बुध चलती है, जो आपके दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी को सक्रिय करती है। फ़रवरी 2031 में गुरु धनु, आपके पाँचवें भाव, में जाते हैं, जून से अक्टूबर 2031 तक वृश्चिक में लौटते हैं, और अक्टूबर 2031 में फिर धनु में आते हैं। 31 जुलाई 2031 को राहु तुला, आपके तीसरे भाव, में प्रवेश करता है।
अपने कौशल से आय में लगातार वृद्धि (प्रबल)। जून से अक्टूबर 2031 तक दोहरा गोचर आपके चौथे, दसवें और बारहवें भाव पर है: संपत्ति, अधिक अधिकार वाली भूमिका, या विदेश में काम और यात्रा (मध्यम)। तीसरे भाव में राहु लेखन, मीडिया और छोटी यात्राओं के लिए अनुकूल है (मध्यम)।
2032
शनि–बुध जारी है। वर्ष के अधिकांश भाग में गुरु का गोचर मकर, आपके छठे भाव, में है, और 30 मई 2032 को शनि मिथुन, आपके ग्यारहवें भाव, में जाते हैं, जिससे चंद्रमा से उनकी ढैया समाप्त होती है।
मार्च से मई 2032 तक दोहरा गोचर आपके दसवें भाव पर है: करियर में एक कदम (मध्यम)। अगस्त से अक्टूबर 2032 तक यह आपके ग्यारहवें, पाँचवें और पहले भाव पर एक साथ पड़ता है: दशक की सबसे अच्छी धन अवधियों में से एक (प्रबल), साथ में संतान या रचनात्मक काम के लिए अच्छा साथ (मध्यम)।
2033
8 मई 2033 को शनि–बुध समाप्त होकर शनि–केतु शुरू होती है। मार्च 2033 से मार्च 2034 तक गुरु का गोचर कुंभ, आपके सातवें भाव, में है, और फ़रवरी 2033 में राहु कन्या, आपके दूसरे भाव, में जाता है।
मार्च 2033 से मार्च 2034 तक दोहरा गोचर आपके ग्यारहवें भाव और लग्न पर पड़ता है: लाभ, पहचान और सेहत की अच्छी आदतों का फल (प्रबल)। सातवें भाव पर गुरु आपकी साझेदारी और समझौतों को सहारा देते हैं (मध्यम)। दूसरे भाव पर राहु के रहते बचत को सट्टे वाली योजनाओं से दूर रखें (हल्का)। केतु की अंतर्दशा ध्यान को भीतर, शोध, आध्यात्मिक साधना और सादगी की ओर मोड़ती है (हल्का)।
2034
16 जून 2034 को शनि–केतु समाप्त होकर शनि–शुक्र शुरू होती है। मार्च 2034 में गुरु मीन, आपके आठवें भाव, में और 12 जुलाई 2034 को शनि कर्क, आपके बारहवें भाव, में जाते हैं। 5 सितंबर 2034 को राहु सिंह, आपके लग्न, में और केतु कुंभ, आपके सातवें भाव, में प्रवेश करते हैं।
शनि–शुक्र आपके दसवें भाव के स्वामी को सक्रिय करती है: करियर, सुख-सुविधा और कलाओं के लिए फलदायी चरण (प्रबल)। जुलाई 2034 से अप्रैल 2035 तक दोहरा गोचर आपके दूसरे और बारहवें भाव पर है: बचत बढ़ती है, और लंबी यात्रा या विदेश प्रवास अनुकूल है (मध्यम)। सातवें भाव पर केतु साथी के साथ धैर्य और साझा समय माँगता है (हल्का)।
2035
शनि–शुक्र जारी है। 6 अप्रैल 2035 को गुरु मेष, आपके नौवें भाव, में जाते हैं, जबकि शनि कर्क, आपके बारहवें भाव, में बने रहते हैं।
अप्रैल 2035 से अप्रैल 2036 तक दोहरा गोचर आपके नौवें भाव पर पड़ता है: उच्च शिक्षा, कोई गुरु या मार्गदर्शक, तीर्थ और पिता के पक्ष से सौभाग्य (प्रबल)। बारहवें भाव में शनि के रहते यात्रा और विदेश से जुड़े ख़र्च ऊँचे रहते हैं (मध्यम)।
जनवरी से सितंबर 2036
शनि–शुक्र जारी है। अप्रैल से सितंबर 2036 तक गुरु का गोचर वृषभ, आपके दसवें भाव, में है, और मार्च 2036 में राहु कर्क, आपके बारहवें भाव, में जाता है। 27 अगस्त 2036 को शनि सिंह, आपके लग्न, में प्रवेश करते हैं, जिससे ज़िम्मेदारी का एक नया लंबा चक्र खुलता है।
अप्रैल से अगस्त 2036 तक दोहरा गोचर आपके दूसरे, छठे और सातवें भाव पर है: दसवें भाव पर गुरु के साथ करियर में पहचान (प्रबल), अच्छी कमाई (मध्यम) और साझेदारी में स्थिर साथ (मध्यम)।
अगले 12 महीने
अक्टूबर 2026 से सितंबर 2027 तक महीने-दर-महीने: चल रही प्रत्यंतर दशा, उस महीने ग्रहों की मुख्य चाल, और किस बात की योजना बनाएँ।
अक्टूबर 2026
15 अक्टूबर 2026 तक राहु–केतु प्रत्यंतर, फिर राहु–शुक्र। 17 अक्टूबर को सूर्य तुला, आपके तीसरे भाव, में और 31 अक्टूबर 2026 को गुरु सिंह, आपके लग्न, में प्रवेश करते हैं। महीने का अंत आत्मविश्वास भरा है: जो योजनाएँ आप चाहते हैं कि लोग देखें, उन्हें शुरू करें (प्रबल)।
लग्न में गुरु आत्मविश्वास और आसपास की सद्भावना बढ़ाते हैं, और शुक्र का प्रत्यंतर बैठकों और बातचीत में आकर्षण जोड़ता है। अगर आप नई भूमिका, पढ़ाई के शुल्क या परिवार की सहमति माँगने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तो यह अनुरोध तैयार करने का महीना है।
नवंबर 2026
राहु–शुक्र प्रत्यंतर। 12 नवंबर 2026 को मंगल सिंह, आपके लग्न, में और 16 नवंबर को सूर्य वृश्चिक, आपके चौथे भाव, में जाते हैं। ऊर्जा और जोश ऊँचे हैं; घर में क्रोध पर नियंत्रण रखें (मध्यम)। दसवें भाव पर दोहरा गोचर वेतन या भूमिका की बातचीत में मददगार है (प्रबल)।
लग्न में मंगल और गुरु दोनों के गोचर से शारीरिक ऊर्जा ऊँची है: उसे बहस के बजाय व्यायाम और किसी कठिन परियोजना में लगाएँ। इस महीने सेहत के लिए नियमित नींद रखें, क्योंकि लग्न में मंगल गर्मी बढ़ाते हैं।
दिसंबर 2026
राहु–शुक्र प्रत्यंतर। 5 दिसंबर 2026 को राहु मकर, आपके छठे भाव, में जाता है, 11 दिसंबर 2026 को शनि मार्गी होते हैं और 13 दिसंबर 2026 को गुरु वक्री होते हैं। रुके काम, ऋण और प्रतिस्पर्धा निपटाने के लिए अच्छा महीना (मध्यम)।
छठे भाव में राहु इंटरव्यू, प्रतियोगी परीक्षाओं और विवादों को उचित माध्यम से सुलझाने के लिए पारंपरिक रूप से मददगार है। काम पर साल के अंत की समीक्षा आपके पक्ष में जाती है, अगर आप धारणाओं के बजाय आँकड़े लेकर जाएँ।
जनवरी 2027
राहु–शुक्र प्रत्यंतर। 10 जनवरी 2027 को मंगल वक्री होते हैं, और 24 जनवरी 2027 को गुरु कर्क, आपके बारहवें भाव, में लौटते हैं। शुरुआत के बजाय समीक्षा करें; यात्रा और परिवार के ख़र्च बढ़ते हैं (हल्का)।
बारहवें भाव में गुरु एकांत, तीर्थ, अस्पताल या दान के काम और विदेशी संपर्कों के अनुकूल हैं। इस महीने वर्ष की योजना बनाएँ, घोषणा नहीं।
फ़रवरी 2027
राहु–शुक्र प्रत्यंतर। 13 फ़रवरी 2027 को सूर्य कुंभ, आपके सातवें भाव, में जाते हैं। साझेदारी और समझौतों पर ध्यान चाहिए, और गुरु से शनि की ओर लंबा बदलाव इसी महीने शुरू होता है (मध्यम)। बड़े और न पलटे जा सकने वाले निर्णयों से बचें।
सातवें भाव से सूर्य के आपके लग्न को देखते हुए, साथी और बिज़नेस से जुड़े सहयोगियों को अधिक जगह दें; इस महीने आग्रह से ज़्यादा साथ जीतता है।
मार्च 2027
10 मार्च 2027 तक राहु–शुक्र प्रत्यंतर, फिर राहु–सूर्य। 9 मार्च 2027 को मंगल कर्क, आपके बारहवें भाव, में और 15 मार्च को सूर्य मीन, आपके आठवें भाव, में जाते हैं। आराम, सेहत जाँच और काग़ज़ी काम इस महीने के लिए ठीक हैं (हल्का)।
बारहवें भाव में मंगल थकान या अतिरिक्त ख़र्च ला सकते हैं; बजट में गुंजाइश रखें और बिना लिखा-पढ़ी के उधार देने से बचें।
अप्रैल 2027
23 अप्रैल 2027 तक राहु–सूर्य प्रत्यंतर, फिर राहु–चंद्र। 13 अप्रैल 2027 को गुरु मार्गी होते हैं, 14 अप्रैल को सूर्य मेष, आपके नौवें भाव, में जाते हैं, और 26 अप्रैल को मंगल सिंह, आपके लग्न, में लौटते हैं। गति लौटती है; पढ़ाई की योजनाओं और मार्गदर्शकों के लिए अच्छा (मध्यम)।
अप्रैल के अंत से चंद्र का प्रत्यंतर आपको परिवार के मूड के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है; माँ के साथ या घर पर बिताया समय आपको फिर से ऊर्जा देता है।
मई 2027
राहु–चंद्र प्रत्यंतर। 15 मई 2027 को सूर्य वृषभ, आपके दसवें भाव, में जाते हैं: काम पर पहचान और अपने परिणाम प्रस्तुत करने का अवसर (मध्यम)।
लग्न से दसवें भाव में सूर्य पारंपरिक रूप से उनकी सबसे अच्छी गोचर स्थितियों में से एक है: वरिष्ठ आपको देखते हैं, और सरकारी या आधिकारिक काम तेज़ी से चलते हैं। जून में जो कुछ स्वीकृत कराना चाहते हैं, उसके काग़ज़ अभी तैयार करें।
जून 2027
राहु–चंद्र प्रत्यंतर। 3 जून 2027 को शनि मेष, आपके नौवें भाव, में जाते हैं, और 25 जून 2027 को गुरु फिर सिंह, आपके लग्न, में आते हैं। दोहरा गोचर आपके नौवें, ग्यारहवें और सातवें भाव को छूता है: लाभ, यात्रा और रिश्ते के निर्णय के लिए वर्ष के सबसे अच्छे महीनों में से एक (प्रबल)।
बारहवें भाव में पाँच महीने के बाद गुरु का आपके लग्न में लौटना फिर से रोशनी में आने जैसा लगता है। इस महीने काम और घर, दोनों जगह सबसे ज़रूरी बातचीत करें।
जुलाई 2027
5 जुलाई 2027 तक राहु–चंद्र प्रत्यंतर, फिर राहु–मंगल। 4 जुलाई को मंगल कन्या, आपके दूसरे भाव, में और 17 जुलाई को सूर्य कर्क, आपके बारहवें भाव, में जाते हैं। ख़र्च पर नज़र रखें और परिवार में नरमी से बोलें (हल्का)।
राहु अंतर्दशा के अंतिम सप्ताहों में मंगल का प्रत्यंतर जल्दबाज़ी और अधीरता ला सकता है। अधूरे काम पूरे करें, बकाया चुकाएँ, और ऐसा कोई विवाद शुरू न करें जिसे नई महादशा में ढोना पड़े।
अगस्त 2027
26 अगस्त 2027 तक राहु–मंगल प्रत्यंतर, जब शनि महादशा शुरू होती है। 9 अगस्त 2027 को शनि वक्री होते हैं। 17 अगस्त को सूर्य सिंह, आपके लग्न, में प्रवेश करते हैं। एक मोड़: जो ज़िम्मेदारी आपको दी जा रही है उसे स्वीकार करें, और वादे छोटे और पक्के रखें (प्रबल)।
नई महादशा के पहले दिन उसका स्वर तय करते हैं। एक अनुशासित आदत शुरू करें, जैसे काम, व्यायाम या प्रार्थना का निश्चित समय, और उसे निभाएँ; शनि तीव्रता से कहीं अधिक लगातार मेहनत का फल देते हैं।
सितंबर 2027
शनि–शनि के पहले सप्ताह। 9 सितंबर 2027 को शुक्र कन्या, आपके दूसरे भाव, में जाते हैं, और 17 सितंबर को सूर्य भी। वे दिनचर्या, बचत योजना और प्रतिबद्धताएँ तय करें जिन्हें आप अगले उन्नीस वर्षों तक साथ रखना चाहते हैं (मध्यम)।
मुख्य मोड़
दशा संधि, यानी दो अवधियों का जोड़, वह समय है जब एक ग्रह के विषय अगले ग्रह को सौंपे जाते हैं। ये बदलाव, और आपके चंद्रमा से शनि के चरण, आने वाले वर्षों की वे धुरियाँ हैं जिन पर जीवन मुड़ता है।
गुरु से शनि: फ़रवरी 2027 से फ़रवरी 2028
आपके अगले बीस वर्षों का सबसे बड़ा मोड़ 26 अगस्त 2027 को आता है, जब गुरु महादशा समाप्त होकर शनि महादशा शुरू होती है; इसकी संधि फ़रवरी 2027 से फ़रवरी 2028 तक है। गुरु आपके लग्न में हैं और पाँचवें व आठवें भाव के स्वामी हैं, इसलिए समापन के वर्ष सीखने, संतान, शोध और निजी नवीनीकरण के रहे हैं।
शनि आपके छठे और सातवें भाव के स्वामी हैं और आपकी जन्म कुंडली में छठे भाव में अपनी राशि में बैठकर हर्ष योग बनाते हैं। उनकी अवधि नियम से काम, सेवा, स्थिर काम और दीर्घकालिक साझेदारी का फल देती है। संधि के वर्ष में जो शुरू किया है उसे पूरा करें, अचानक इस्तीफ़े या बड़े सट्टे वाले दाँव से बचें, और नई अवधि शुरू होने के बाद नई ज़िम्मेदारी लें।
शनि–शनि से शनि–बुध: जुलाई से सितंबर 2030
29 अगस्त 2030 को शनि की अंतर्दशा बुध को सौंपी जाती है, जिसकी संधि जुलाई से सितंबर 2030 तक है। बुध आपके दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं और आपके लग्न में हैं, इसलिए ध्यान ढाँचा बनाने से उससे कमाने की ओर जाता है: आय, बचत, व्यापार और संवाद।
शनि–बुध से शनि–केतु: अप्रैल से जून 2033
8 मई 2033 को बुध की अंतर्दशा केतु को सौंपी जाती है, जो आपकी जन्म कुंडली में ग्यारहवें भाव में है। अप्रैल से जून 2033 की संधि लाभ इकट्ठा करने से सादगी की ओर बदलाव है: कुछ लक्ष्यों का आकर्षण घटता है, और शोध, आध्यात्मिक साधना और शांत काम का मूल्य बढ़ता है। बदलाव के समय वित्त को सरल रखें।
शनि–केतु से शनि–शुक्र: मई से जुलाई 2034
16 जून 2034 को केतु की अंतर्दशा शुक्र को सौंपी जाती है, जो आपके तीसरे और दसवें भाव के स्वामी हैं और आपके लग्न में हैं। मई से जुलाई 2034 की संधि करियर में वृद्धि, सुख-सुविधा, रचनात्मक काम और संबंधों पर ध्यान के तीन वर्षों का चरण खोलती है।
आपके चंद्रमा से शनि के चरण
अभी आप साढ़े साती में नहीं हैं। आपके चंद्रमा से शनि की ढैया, जब शनि का गोचर वृषभ में, यानी चंद्रमा से आठवें भाव में होता है, अगस्त 2029 से मई 2032 तक है: अपनी गति संभालने, सेहत की दिनचर्या बचाने और ज़रूरत से ज़्यादा ज़िम्मेदारी न लेने का समय। 27 अगस्त 2036 को शनि सिंह, आपके लग्न, में प्रवेश करते हैं, और आपकी साढ़े साती अक्टूबर 2038 से दिसंबर 2046 तक अपेक्षित है, जब तक शनि महादशा आपको उसके लिए अच्छी तरह तैयार कर चुकी होगी।
विवाह और रिश्तों का समय
रिश्तों का समय आपके सातवें भाव (कुंभ) और उसके स्वामी शनि से, शुक्र से, सातवें भाव या उसके स्वामी पर गुरु और शनि के दोहरे गोचर से, और इन ग्रहों की दशाओं से पढ़ा जाता है। संतान को इसी तरह आपके पाँचवें भाव (धनु) से पढ़ा जाता है, जिसके स्वामी गुरु आपके लग्न में हैं।
लगन की आपकी सबसे प्रबल अवधियाँ
जून से अक्टूबर 2027 · मध्यम से प्रबल। शनि महादशा के निकट आते हुए दोहरा गोचर आपके सातवें भाव को छूता है; गंभीर बातचीत या सगाई के लिए अच्छा समय।
फ़रवरी 2028 से जनवरी 2030 · प्रबल। आपके सप्तमेश शनि की अपनी महादशा और अंतर्दशा चलती है, जबकि दोहरा गोचर आपके सातवें भाव और उसके स्वामी को छूता है। शिखर अगस्त से अक्टूबर 2029 में है, जब दोहरा गोचर सीधे सातवें भाव पर पड़ता है।
मई से सितंबर 2030 · प्रबल। दोहरा गोचर फिर आपके सातवें भाव पर पड़ता है, विवाह या औपचारिक साझेदारी की दूसरी स्पष्ट अवधि।
मार्च 2033 से मार्च 2034 · मध्यम। गुरु का गोचर कुंभ, आपके सातवें भाव, में है, जो विवाहितों के लिए लगन के नवीनीकरण और साझा योजनाओं में मददगार है।
वे अवधियाँ जो धैर्य माँगती हैं
दिसंबर 2026 तक राहु का गोचर कुंभ, आपके सातवें भाव, में है: अपेक्षाएँ वास्तविकता से आगे दौड़ सकती हैं, इसलिए निर्णय से पहले समय लें (हल्का)। अगस्त 2029 से मई 2032 तक चंद्रमा से शनि की ढैया में काम साथ के समय को घेर सकता है (मध्यम)। सितंबर 2034 से मार्च 2036 तक केतु का गोचर आपके सातवें भाव में है: कुछ दूरी या उदासीनता संभव है, और नियमित साझा समय और खुली बातचीत इसका उपाय है (हल्का)।
लग्न से आपका हल्का मंगल दोष मिलान में दूसरे व्यक्ति की पूरी कुंडली के साथ तौला जाता है; यह किसी अच्छे रिश्ते को टालने का कारण नहीं है।
संतान
नवंबर 2026 से जनवरी 2027 · मध्यम। दोहरा गोचर आपके संतान वाले पाँचवें भाव पर पड़ता है, जबकि राहु अंतर्दशा उस पाँचवें भाव को सक्रिय करती है जहाँ आपकी जन्म कुंडली में राहु है।
अक्टूबर के अंत से नवंबर 2027 · हल्का से मध्यम। पाँचवें भाव पर उसी दोहरे गोचर की एक छोटी पुनरावृत्ति।
फ़रवरी से जून 2031, और अक्टूबर 2031 से मार्च 2032 · मध्यम। शनि–बुध की अवधि में गुरु का गोचर धनु, आपके पाँचवें भाव, में है।
अगस्त से अक्टूबर 2032 · मध्यम। दोहरा गोचर एक बार फिर आपके पाँचवें भाव पर पड़ता है। परिवार की योजना निजी और चिकित्सीय विषय है; ये पारंपरिक मददगार अवधियाँ हैं, निर्देश नहीं।
करियर और धन का समय
काम आपके दसवें भाव (वृषभ, स्वामी शुक्र आपके लग्न में) से, आय दूसरे और ग्यारहवें भाव (दोनों के स्वामी बुध) से, घर चौथे से, लंबी यात्राएँ नौवें से और विदेश बारहवें भाव से पढ़े जाते हैं, साथ में दोहरा गोचर और आपकी दशाएँ।
नौकरी बदलना और पदोन्नति
नवंबर 2026 से जनवरी 2027 · प्रबल: दोहरा गोचर आपके दसवें भाव पर पड़ता है जबकि गुरु का गोचर आपके लग्न में है। नवंबर 2027 से फ़रवरी 2028 · प्रबल: शनि महादशा की शुरुआत में दोहरा गोचर सीधे दसवें भाव पर पड़ता है, अधिक ज़िम्मेदारी वाली भूमिका के लिए सबसे अच्छी अवधि।
अप्रैल 2030 से मई 2032 तक शनि का गोचर वृषभ, आपके दसवें भाव, में है, और जुलाई 2031 तक केतु भी वहीं है: अधिक ज़िम्मेदारी और आसपास पुनर्गठन (मध्यम)। नौकरी तभी बदलें जब पक्का प्रस्ताव हाथ में हो। मार्च से मई 2032 · मध्यम: उस मेहनत के बाद एक कदम आगे। अप्रैल से सितंबर 2036 · प्रबल: आपके दसवें भाव में गुरु का गोचर पहचान लाता है।
व्यापार और साझेदारी
अगस्त 2030 से मई 2033 तक शनि–बुध व्यापार, सलाह के काम, लेखा और संवाद पर बने किसी भी काम के अनुकूल है (मध्यम से प्रबल)। साझेदारी वाला व्यापार सातवें भाव पर दोहरे गोचर की अवधियों, फ़रवरी 2028 से जनवरी 2030 और मई से सितंबर 2030, में औपचारिक करना सबसे अच्छा है (मध्यम)।
धन का लाभ और हानि
लाभ: दिसंबर 2028 से मार्च 2029, अक्टूबर 2029 से जनवरी 2030, अगस्त से अक्टूबर 2032, और मार्च 2033 से मार्च 2034 · प्रबल, जब दोहरा गोचर आपके ग्यारहवें भाव पर पड़ता है। बचत: नवंबर 2027 से फ़रवरी 2028 और जुलाई 2034 से अप्रैल 2035 · मध्यम, दूसरे भाव पर दोहरे गोचर के साथ।
जनवरी से जून 2027 तक, गुरु के कर्क, आपके बारहवें भाव, में गोचर के साथ ख़र्च ऊँचा रहता है (हल्का)। फ़रवरी 2033 से सितंबर 2034 तक राहु का गोचर कन्या, आपके दूसरे भाव, में है: सट्टे वाली योजनाओं और बिना लिखा-पढ़ी के उधार से बचें (मध्यम)। जुलाई 2034 से अगस्त 2036 तक शनि का गोचर आपके बारहवें भाव में है: यात्रा और विदेश से जुड़े ख़र्च का बजट रखें (मध्यम)।
संपत्ति और वाहन
सितंबर 2030 से फ़रवरी 2031, और जून से अक्टूबर 2031 · मध्यम से प्रबल: दोहरा गोचर आपके घर, भूमि और वाहन वाले चौथे भाव पर पड़ता है। जनवरी से मई 2030 · मध्यम: गुरु का गोचर वृश्चिक, आपके चौथे भाव, में है। जनवरी 2030 से जुलाई 2031 तक उसी भाव में राहु के गोचर के कारण स्वामित्व और काग़ज़ विशेष सावधानी से जाँचें।
विदेश यात्रा, प्रवास और शिक्षा
जून से अक्टूबर 2027 और अप्रैल 2035 से अप्रैल 2036 · मध्यम से प्रबल: दोहरा गोचर आपके नौवें भाव पर पड़ता है, जो लंबी दूरी की यात्रा, उच्च शिक्षा और तीर्थ के अनुकूल है। सितंबर 2030 से फ़रवरी 2031, जून से अक्टूबर 2031, मार्च से मई 2032 और जुलाई 2034 से अप्रैल 2035 · मध्यम: दोहरा गोचर आपके बारहवें भाव पर है, जो विदेश में काम या लंबे प्रवास का पारंपरिक सहारा है।
जून 2028 से जनवरी 2030 तक राहु का गोचर धनु, आपके पाँचवें भाव, में है: किसी नई योग्यता, तकनीकी पाठ्यक्रम या प्रमाणपत्र की ओर प्रबल खिंचाव (मध्यम)।
सोलह वर्ग कुंडलियाँ
पराशर हर राशि को सूक्ष्म भागों में बाँटते हैं ताकि जीवन के अलग-अलग क्षेत्र पढ़े जा सकें। ये षोडशवर्ग की सोलह कुंडलियाँ हैं। हर खंड अपनी कुंडली का नाम लेता है, क्योंकि किसी वर्ग कुंडली की स्थिति आपकी जन्म कुंडली की स्थिति नहीं है।
राशि (D1) और होरा (D2)
राशि कुंडली स्वयं आपकी जन्म कुंडली है, जिसका वर्णन पूरी रिपोर्ट में है। धन की कुंडली होरा (D2) में आपका लग्न सिंह है और सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु और शुक्र सभी सूर्य की होरा, सिंह, में आते हैं: मेहनत, प्रतिष्ठा और अपने नाम से कमाया धन।
द्रेष्काण (D3) और चतुर्थांश (D4)
भाई-बहनों और साहस की कुंडली द्रेष्काण (D3) में आपका लग्न सिंह है और मंगल अपनी राशि मेष में हैं: साहस और पहल सच्ची शक्तियाँ हैं, और भाई-बहन ऊर्जावान और स्वतंत्र होने की संभावना है।
घर, संपत्ति और भाग्य की कुंडली चतुर्थांश (D4) में आपका लग्न सिंह है और गुरु D4 लग्न में बैठे हैं, जिसे परंपरा में घर और स्थायी संपत्ति के लिए रक्षक संकेत माना जाता है।
सप्तांश (D7) और नवांश (D9)
संतान की कुंडली सप्तांश (D7) में लग्न कन्या है और मंगल D7 लग्न से पाँचवीं राशि मकर में उच्च के हैं: संतान के लिए बलवान, ऊर्जावान संकेत।
विवाह, धर्म और भीतरी बल की कुंडली नवांश (D9) में लग्न वृषभ है, चंद्रमा तुला में ही रहते हैं (वर्गोत्तम) और शुक्र कर्क में हैं, जो स्नेह की राशि है। आपका भीतरी स्वभाव सुरक्षा, निष्ठा और धैर्य को महत्व देता है।
दशमांश (D10) और द्वादशांश (D12)
करियर की कुंडली दशमांश (D10) में लग्न तुला है और चंद्रमा उसी में हैं, मंगल D10 के सातवें में अपनी राशि मेष में हैं, और गुरु D10 के ग्यारहवें में सिंह में हैं: कूटनीति, मज़बूत साझेदारियाँ और प्रतिष्ठा से लाभ।
माता-पिता की कुंडली द्वादशांश (D12) में लग्न तुला है और गुरु D12 लग्न से ग्यारहवीं राशि सिंह में हैं, जो माता-पिता से मिलने वाले साथ का शुभ संकेत है।
षोडशांश (D16) और विंशांश (D20)
वाहन और सुख-सुविधाओं की कुंडली षोडशांश (D16) में लग्न वृश्चिक है और गुरु D16 के दसवें, सिंह, में हैं: सुख-सुविधाएँ प्रायः काम और प्रतिष्ठा से आती हैं।
आध्यात्मिक साधना की कुंडली विंशांश (D20) में लग्न मेष है, मंगल D20 लग्न में अपनी राशि में हैं और गुरु धनु, अपनी राशि, में हैं: अनुशासित, सक्रिय साधना आपको जँचती है, किसी सम्मानित गुरु के मार्गदर्शन में।
चतुर्विंशांश (D24) और भांश (D27)
शिक्षा की कुंडली चतुर्विंशांश (D24) में लग्न मकर है और शनि D24 लग्न में स्वराशि में हैं: धीमी, गहरी और व्यवस्थित पढ़ाई, और लगन से मिलने वाली योग्यताएँ।
बल और सहनशक्ति की कुंडली भांश (D27) में लग्न कन्या है, गुरु मेष में और शुक्र मकर में हैं, जबकि सूर्य, मंगल और शनि D27 के छठे, कुंभ, में एकत्र हैं: सहनशक्ति जो सबसे अधिक काम और सेवा में दिखती है।
त्रिंशांश (D30) और खवेदांश (D40)
परंपरा में कठिनाइयों और चरित्र के लिए पढ़ी जाने वाली त्रिंशांश (D30) कुंडली में लग्न कुंभ है और गुरु D30 के तीसरे, मेष, में हैं: कठिनाई का सामना साहस और अच्छे विवेक से करने की क्षमता।
मातृ पक्ष की विरासत की कुंडली खवेदांश (D40) में लग्न धनु है और चंद्रमा अपनी राशि कर्क में हैं: माता के पक्ष से स्नेहपूर्ण, सहयोगी विरासत।
अक्षवेदांश (D45) और षष्ट्यंश (D60)
पितृ पक्ष की विरासत और आचरण की कुंडली अक्षवेदांश (D45) में लग्न वृषभ है, चंद्रमा सिंह में हैं और गुरु भी सिंह में बैठे हैं।
सबसे सूक्ष्म विभाजन और परंपरा में पूर्व कर्म की कुंडली षष्ट्यंश (D60) में लग्न सिंह है, वही जो आपका जन्म लग्न है, और गुरु D60 लग्न में बैठे हैं। D60 लग्न का जन्म लग्न से मेल ऐसे जीवन का संकेत माना जाता है जिसमें बाहरी मार्ग और भीतरी कर्म एक ही दिशा दिखाते हैं।
सभी वर्गों में दिखता सूत्र
सिंह के 0°08′ पर बैठे आपके गुरु सोलह में से ग्यारह वर्ग कुंडलियों में सिंह में आते हैं: राशि, होरा, द्रेष्काण, चतुर्थांश, सप्तांश, दशमांश, द्वादशांश, षोडशांश, चतुर्विंशांश, अक्षवेदांश और षष्ट्यंश। इतने वर्गों में एक ही राशि पर टिका ग्रह परंपरा में स्थिर, भरोसेमंद प्रभाव माना जाता है। आपके लिए वह ग्रह गुरु हैं: ज्ञान, परामर्श और विकास जीवन के हर क्षेत्र में लौटते हैं।
अष्टकवर्ग विस्तार से
आपके भावों के अंक
आपका सर्वाष्टकवर्ग कुल 337 है, जो शास्त्रीय निश्चित योग है। लग्न से भाव के अनुसार अंक हैं: पहला 30, दूसरा 21, तीसरा 26, चौथा 27, पाँचवाँ 27, छठा 32, सातवाँ 19, आठवाँ 27, नौवाँ 28, दसवाँ 37, ग्यारहवाँ 41 और बारहवाँ 22। परंपरा में 28 या अधिक अंक बलवान माने जाते हैं; 25 से कम पर सावधानी चाहिए।
आपके सबसे बलवान भाव ग्यारहवाँ (41, लाभ और संपर्क) और दसवाँ (37, करियर और प्रतिष्ठा) हैं, फिर छठा (32, काम और सेवा)। सावधानी माँगने वाले भाव सातवाँ (19, साझेदारी), दूसरा (21, बचत) और बारहवाँ (22, खर्च) हैं। कुंडली अच्छी कमाई और मेहनत दिखाती है, और बचत, खर्च और साझेदारी में सोच-समझकर चलने को कहती है।
विंशोत्तरी, योगिनी और चर दशा
विंशोत्तरी
आप 26 अगस्त 2027 तक गुरु महादशा में हैं, उसकी अंतिम अंतर्दशा राहु में। फिर आपकी उन्नीस वर्ष की शनि महादशा शुरू होती है, शनि, बुध, केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु और गुरु अंतर्दशाओं के साथ, 26 अगस्त 2046 तक, और उसके बाद 2063 तक बुध महादशा।
योगिनी, और जहाँ दोनों सहमत हैं
योगिनी दशा में आप 28 नवंबर 2026 तक राहु की संकटा में हैं; फिर नवंबर 2027 तक चंद्रमा की मंगला, नवंबर 2029 तक सूर्य की पिंगला, नवंबर 2032 तक गुरु की धान्या, नवंबर 2036 तक मंगल की भ्रामरी और नवंबर 2041 तक बुध की भद्रिका।
दोनों पद्धतियाँ अभी उल्लेखनीय रूप से सहमत हैं: दोनों एक ही समय राहु की अवधि चला रही हैं, योगिनी में संकटा और विंशोत्तरी में राहु अंतर्दशा। और 2030 के आसपास दोनों गुरु और बुध की ओर मुड़ती हैं, धान्या योगिनी (2029–2032) और बुध अंतर्दशा (2030–2033), जिसे परंपरा में शिक्षा और लाभ का बलवान समय माना जाता है।
जैमिनी चर दशा
जैमिनी की चर दशा ग्रहों के बजाय राशियों से चलती है। आपकी चर दशा जन्म पर सिंह दशा से शुरू हुई और 14 अगस्त 2020 से मकर दशा चल रही है; यह बारह वर्ष, 14 अगस्त 2032 तक चलती है, क्योंकि मकर के स्वामी शनि मकर में ही, अपने घर में बैठे हैं। फिर कुंभ दशा (दो वर्ष, 2034 तक), मीन (सात वर्ष, 2041 तक), मेष (चार वर्ष, 2045 तक), वृषभ (तीन वर्ष, 2048 तक) और मिथुन (दो वर्ष, 2050 तक) आती हैं।
मकर आपकी जन्म कुंडली का छठा भाव है, काम, सेवा और बाधाओं पर विजय का भाव, और उसमें शनि हैं। 2027 में शुरू होने वाली शनि महादशा से मेल खाती बारह वर्ष की मकर दशा तीसरी पद्धति है जो उसी विषय की ओर संकेत करती है: अनुशासित काम, स्थिर प्रयास और वर्षों में बनने वाले फल।
KP: नक्षत्र और उप स्वामी
कृष्णमूर्ति पद्धति (KP) हर स्थिति को राशि स्वामी, नक्षत्र स्वामी और उप स्वामी देती है, जिससे हर ग्रह का पाठ और सूक्ष्म होता है।
लग्न और चंद्रमा
आपके लग्न का नक्षत्र स्वामी केतु (मघा) और उप स्वामी राहु है। KP में लग्न का उप स्वामी व्यक्ति की समग्र दिशा बताता है; राहु का उप महत्वाकांक्षा, नए रूप में ढलने और अलग राह का संकेत है।
आपके चंद्रमा का नक्षत्र स्वामी मंगल (चित्रा) और उप स्वामी शुक्र है। आपकी कुंडली का मन मंगल से ऊर्जा और शुक्र से परिष्कार पाता है: तेज़ भावना, सौंदर्य और सामंजस्य से प्रेम।
बाकी ग्रह
पाँच ग्रहों, सूर्य, बुध, शुक्र, राहु और केतु, का उप स्वामी शनि है, जो असामान्य है और आपकी कुंडली और आने वाली शनि महादशा के शनि वाले स्वर को पक्का करता है: स्थिर, व्यवस्थित फल। शनि का अपना उप स्वामी शुक्र है, गुरु का केतु और मंगल का बुध।
आपका आने वाला वर्ष (वर्षफल)
2026–27 का वर्षफल
आपका छत्तीसवाँ वर्ष 15 अगस्त 2026 को 05:56 IST पर आपकी सूर्य वापसी से शुरू हुआ। वर्ष लग्न कर्क है और मुंथा वार्षिक पहले भाव में है, जिसके स्वामी चंद्रमा हैं। वर्ष के अधिकारी चंद्रमा और सूर्य हैं, दोनों चार में से दो-दो पद सँभालते हैं: मकसद और घर-परिवार की देखभाल में संतुलन का वर्ष, और वार्षिक लग्न में गुरु रक्षक उपस्थिति के रूप में।
उपाय
उपाय आपकी कुंडली के साथ काम करने के तरीके हैं, गारंटी नहीं। नीचे दिए उपाय आपकी कुंडली के उन ग्रहों के अनुसार हैं जिन्हें सहारे की ज़रूरत है। जो सही लगे वह अपनाएँ, बाकी छोड़ दें।
सूर्य के लिए, बारहवें भाव में आपके लग्नेश
उगते सूर्य को जल अर्पित करना, रविवार को गायत्री मंत्र या आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ, और पिता व बड़ों के प्रति सम्मान के सरल कार्य क्लासिक उपाय हैं। बारहवें भाव की स्थिति को देखते हुए, नींद और शांत समय की रक्षा करने वाली दिनचर्या अपने आप में यहाँ सूर्य का उपाय है।
मंत्र: ॐ सूर्याय नमः, रविवार सुबह 108 बार। दान: रविवार को गेहूँ, गुड़ या लाल वस्त्र। रुद्राक्ष: एकमुखी, जो पारंपरिक रूप से सूर्य से जुड़ा है।
शनि के लिए, आने वाली महादशा के स्वामी
आपकी कुंडली में शनि पहले से बलवान हैं, इसलिए पारंपरिक सलाह उन्हें मनाने के बजाय उनका साथ देने की है: वादे निभाएँ, कम पारिश्रमिक पर मेहनत करने वालों की सेवा करें, और शरीर को सक्रिय रखें। बहुत-से परिवार शनिवार को तिल के तेल का दीपक जलाते हैं या शनि स्तोत्र का पाठ करते हैं। शनि महादशा से पहले और उसके दौरान शनिवार को श्रमिकों या बुज़ुर्गों को दान एक पारंपरिक उपाय है।
मंत्र: ॐ शं शनैश्चराय नमः, शनिवार को 108 बार, विशेष रूप से 26 अगस्त 2027 को शनि महादशा की शुरुआत से, और अगस्त 2029 से मई 2032 तक शनि की ढैया के दौरान। दान: शनिवार को काले तिल, सरसों का तेल या गर्म कंबल। व्रत: सेहत अनुमति दे तो शनिवार का सादा व्रत।
मंगल और मांगलिक दोष के लिए
लग्न में बलवान मंगल का सबसे व्यावहारिक उपाय नियमित व्यायाम है। पारंपरिक रूप से मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ और हनुमान मंदिर जाना मंगल को शांत करने से जुड़ा है।
मंत्र: ॐ भौमाय नमः, मंगलवार को 108 बार। दान: मंगलवार को मसूर की दाल। रुद्राक्ष: तीनमुखी।
राहु के लिए, अगस्त 2027 तक
आपकी जन्म कुंडली में राहु पाँचवें भाव में है। इसकी अंतर्दशा 26 अगस्त 2027 तक चलती है: शनिवार को ॐ राहवे नमः का 108 बार जाप करें, और देवी दुर्गा की उपासना राहु का पारंपरिक उपाय है। इस अंतर्दशा में अपने वित्त को सट्टे और शॉर्टकट से दूर रखें।
गुरु के लिए, आपके पाँचवें भाव के स्वामी
गुरु आपके संतान और शिक्षा वाले पाँचवें भाव के और आठवें भाव के भी स्वामी हैं, और आपके लग्न में अस्त हैं। मंत्र: ॐ बृहस्पतये नमः, गुरुवार को 108 बार। गुरुजनों का सम्मान और गुरुवार को पुस्तकें, हल्दी या चने की दाल का दान पारंपरिक है; रुद्राक्ष पाँचमुखी है।
रत्न
शास्त्र माणिक्य को सूर्य से और मूंगे को मंगल से जोड़ते हैं, जो सिंह लग्न के योगकारक हैं। रत्न एक पारंपरिक उपाय है, नुस्ख़ा नहीं। कोई भी रत्न पहनने से पहले किसी भरोसेमंद ज्योतिषी से पूरी कुंडली दिखाएँ, और कभी भी महँगा रत्न ख़रीदने का दबाव महसूस न करें।
आपके लग्नेश सूर्य के लिए माणिक्य: सोने या ताँबे में, अनामिका में, पहली बार रविवार सुबह पहनें; लाल तामड़ा या लाल स्पिनेल पारंपरिक विकल्प हैं। चौथे और नौवें भाव के स्वामी मंगल के लिए मूंगा: सोना या ताँबा, अनामिका, मंगलवार सुबह; लाल अकीक इसका विकल्प है। गुरु के लिए पुखराज: सोना, तर्जनी, गुरुवार सुबह; सुनहला या पीला पुखराज (टोपाज़) विकल्प हैं, और क्योंकि गुरु आपके आठवें भाव के भी स्वामी हैं, परंपरा इस रत्न में विशेष सावधानी कहती है। वज़न आपकी कुंडली देखने वाले ज्योतिषी तय करते हैं।
यह रिपोर्ट कैसे बनी
हर स्थिति की गणना iAstroGuru Engine ने की: लाहिड़ी अयनांश, पूर्ण राशि भाव, सोलह वर्गों और अष्टकवर्ग के लिए पराशरी नियम, विंशोत्तरी और योगिनी दशाएँ, के.एन. राव पद्धति से जैमिनी चर दशा, मानक 249 उप विभाजन से KP स्वामी, और वर्षफल के लिए ताजिक सूर्य वापसी।
पाठ इन्हीं गणित तथ्यों से लिखा गया और जारी करने से पहले कुंडली से स्वतः जाँचा गया। ज्योतिष एक व्याख्यात्मक परंपरा है, और यहाँ कुछ भी चिकित्सा, कानूनी या पैसे संबंधी सलाह नहीं है। यह नमूना एक काल्पनिक व्यक्ति, आरव शर्मा, के लिए तैयार किया गया था।
परिशिष्ट: आपकी गणनाएँ
इस रिपोर्ट के पीछे की पूरी तालिकाएँ, iAstroGuru इंजन द्वारा आपके जन्म जानकारी से गणना की गई। निरयन राशिचक्र, लाहिड़ी अयनांश; तिथियाँ दिन तक दी गई हैं।
| नाम | Aarav Sharma |
|---|---|
| जन्म तिथि | 15 अग॰ 1991 |
| जन्म समय | 06:40 |
| जन्म स्थान | Jaipur, Rajasthan, India |
| अक्षांश, देशांतर | 26.9124°, 75.7873° |
| समय क्षेत्र | Asia/Kolkata (UTC+05:30) |
| वार | गुरुवार |
| तिथि | शुक्ल षष्ठी |
| नक्षत्र | चित्रा |
| योग | शुभ |
| करण | कौलव |
| सूर्योदय | 05:57:57 |
| सूर्यास्त | 19:04:33 |
| अयनांश (लाहिड़ी) | 23°44′41″ |
सूर्योदय और सूर्यास्त उसी घड़ी पर हैं जिस पर जन्म समय दिया गया है।
ग्रह स्थिति
व = वक्री, अ = अस्त। ग्रह स्थिति और नक्षत्र लाहिड़ी अयनांश से हैं; भाव लग्न से पूरी राशियों में गिने गए हैं। अवस्था राशि में अंश से बालादि अवस्था है। नक्षत्र और उप स्वामी केपी (कृष्णमूर्ति) अयनांश से हैं।
| ग्रह | भोगांश | राशि | अंश | नक्षत्र · पद | नक्षत्र स्वामी | उप स्वामी | भाव | बल | व / अ | अवस्था |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लग्न | 126°18′41″ | सिंह | 6°18′41″ | मघा 2 | केतु | राहु | 1 | — | — | — |
| सूर्य | 117°59′44″ | कर्क | 27°59′44″ | आश्लेषा 4 | बुध | शनि | 12 | मित्र राशि | — | बाल |
| चंद्र | 182°47′53″ | तुला | 2°47′53″ | चित्रा 3 | मंगल | शुक्र | 3 | सम राशि | — | बाल |
| मंगल | 145°16′21″ | सिंह | 25°16′21″ | पूर्वा फाल्गुनी 4 | शुक्र | बुध | 1 | मित्र राशि | — | मृत |
| बुध | 129°57′16″ | सिंह | 9°57′16″ | मघा 3 | केतु | शनि | 1 | मित्र राशि | व अ | कुमार |
| गुरु | 120°08′13″ | सिंह | 0°08′13″ | मघा 1 | केतु | केतु | 1 | मित्र राशि | अ | बाल |
| शुक्र | 130°01′24″ | सिंह | 10°01′24″ | मघा 4 | केतु | शनि | 1 | शत्रु राशि | व | कुमार |
| शनि | 278°23′23″ | मकर | 8°23′23″ | उत्तराषाढ़ा 4 | सूर्य | शुक्र | 6 | स्वराशि | व | वृद्ध |
| राहु | 263°25′12″ | धनु | 23°25′12″ | पूर्वाषाढ़ा 4 | शुक्र | शनि | 5 | — | — | वृद्ध |
| केतु | 83°25′12″ | मिथुन | 23°25′12″ | पुनर्वसु 2 | गुरु | शनि | 11 | — | — | वृद्ध |
वर्ग कुंडलियाँ (षोडशवर्ग)
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: सिंह
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | कर्क | 12 | 28.00° | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 3 | 2.80° | मार्गी |
| मंगल | सिंह | 1 | 25.27° | मार्गी |
| बुध | सिंह | 1 | 9.95° | वक्री · अस्त |
| गुरु | सिंह | 1 | 0.14° | मार्गी · अस्त |
| शुक्र | सिंह | 1 | 10.02° | वक्री |
| शनि | मकर | 6 | 8.39° | वक्री |
| राहु | धनु | 5 | 23.42° | मार्गी |
| केतु | मिथुन | 11 | 23.42° | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: सिंह
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | सिंह | 1 | — | मार्गी |
| चंद्र | सिंह | 1 | — | मार्गी |
| मंगल | कर्क | 12 | — | मार्गी · नीच |
| बुध | सिंह | 1 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 1 | — | मार्गी |
| शुक्र | सिंह | 1 | — | वक्री |
| शनि | कर्क | 12 | — | वक्री |
| राहु | कर्क | 12 | — | मार्गी |
| केतु | कर्क | 12 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: सिंह
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मीन | 8 | — | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 3 | — | मार्गी |
| मंगल | मेष | 9 | — | मार्गी |
| बुध | सिंह | 1 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 1 | — | मार्गी |
| शुक्र | धनु | 5 | — | वक्री |
| शनि | मकर | 6 | — | वक्री |
| राहु | सिंह | 1 | — | मार्गी |
| केतु | कुंभ | 7 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: सिंह
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मेष | 9 | — | मार्गी · उच्च |
| चंद्र | तुला | 3 | — | मार्गी |
| मंगल | वृषभ | 10 | — | मार्गी |
| बुध | वृश्चिक | 4 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 1 | — | मार्गी |
| शुक्र | वृश्चिक | 4 | — | वक्री |
| शनि | मेष | 9 | — | वक्री · नीच |
| राहु | कन्या | 2 | — | मार्गी |
| केतु | मीन | 8 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: कन्या
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | कर्क | 11 | — | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 2 | — | मार्गी |
| मंगल | मकर | 5 | — | मार्गी · उच्च |
| बुध | तुला | 2 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 12 | — | मार्गी |
| शुक्र | तुला | 2 | — | वक्री |
| शनि | सिंह | 12 | — | वक्री |
| राहु | वृषभ | 9 | — | मार्गी |
| केतु | वृश्चिक | 3 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: वृषभ
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मीन | 11 | — | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 6 | — | मार्गी |
| मंगल | वृश्चिक | 7 | — | मार्गी |
| बुध | मिथुन | 2 | — | वक्री |
| गुरु | मेष | 12 | — | मार्गी |
| शुक्र | कर्क | 3 | — | वक्री |
| शनि | मीन | 11 | — | वक्री |
| राहु | वृश्चिक | 7 | — | मार्गी |
| केतु | वृषभ | 1 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: तुला
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | धनु | 3 | — | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 1 | — | मार्गी |
| मंगल | मेष | 7 | — | मार्गी |
| बुध | वृश्चिक | 2 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 11 | — | मार्गी |
| शुक्र | वृश्चिक | 2 | — | वक्री |
| शनि | वृश्चिक | 2 | — | वक्री |
| राहु | कर्क | 10 | — | मार्गी |
| केतु | मकर | 4 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: तुला
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मिथुन | 9 | — | मार्गी |
| चंद्र | वृश्चिक | 2 | — | मार्गी · नीच |
| मंगल | मिथुन | 9 | — | मार्गी |
| बुध | वृश्चिक | 2 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 11 | — | मार्गी |
| शुक्र | धनु | 3 | — | वक्री |
| शनि | मेष | 7 | — | वक्री · नीच |
| राहु | कन्या | 12 | — | मार्गी |
| केतु | मीन | 6 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: वृश्चिक
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मिथुन | 8 | — | मार्गी |
| चंद्र | वृषभ | 7 | — | मार्गी · उच्च |
| मंगल | कन्या | 11 | — | मार्गी |
| बुध | मकर | 3 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 10 | — | मार्गी |
| शुक्र | मकर | 3 | — | वक्री |
| शनि | सिंह | 10 | — | वक्री |
| राहु | धनु | 2 | — | मार्गी |
| केतु | धनु | 2 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: मेष
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | तुला | 7 | — | मार्गी · नीच |
| चंद्र | वृषभ | 2 | — | मार्गी · उच्च |
| मंगल | मेष | 1 | — | मार्गी |
| बुध | मिथुन | 3 | — | वक्री |
| गुरु | धनु | 9 | — | मार्गी |
| शुक्र | मिथुन | 3 | — | वक्री |
| शनि | कन्या | 6 | — | वक्री |
| राहु | वृश्चिक | 8 | — | मार्गी |
| केतु | वृश्चिक | 8 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: मकर
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | वृषभ | 5 | — | मार्गी |
| चंद्र | तुला | 10 | — | मार्गी |
| मंगल | मेष | 4 | — | मार्गी |
| बुध | मीन | 3 | — | वक्री · नीच |
| गुरु | सिंह | 8 | — | मार्गी |
| शुक्र | मेष | 4 | — | वक्री |
| शनि | मकर | 1 | — | वक्री |
| राहु | कुंभ | 2 | — | मार्गी |
| केतु | कुंभ | 2 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: कन्या
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | कुंभ | 6 | — | मार्गी |
| चंद्र | धनु | 4 | — | मार्गी |
| मंगल | कुंभ | 6 | — | मार्गी |
| बुध | धनु | 4 | — | वक्री |
| गुरु | मेष | 8 | — | मार्गी |
| शुक्र | मकर | 5 | — | वक्री |
| शनि | कुंभ | 6 | — | वक्री |
| राहु | मकर | 5 | — | मार्गी |
| केतु | कर्क | 11 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: कुंभ
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | वृश्चिक | 10 | — | मार्गी |
| चंद्र | मेष | 3 | — | मार्गी |
| मंगल | तुला | 9 | — | मार्गी |
| बुध | कुंभ | 1 | — | वक्री |
| गुरु | मेष | 3 | — | मार्गी |
| शुक्र | धनु | 11 | — | वक्री |
| शनि | कन्या | 8 | — | वक्री |
| राहु | मिथुन | 5 | — | मार्गी |
| केतु | मिथुन | 5 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: धनु
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | वृश्चिक | 12 | — | मार्गी |
| चंद्र | कर्क | 8 | — | मार्गी |
| मंगल | मकर | 2 | — | मार्गी · उच्च |
| बुध | वृषभ | 6 | — | वक्री |
| गुरु | मेष | 5 | — | मार्गी |
| शुक्र | वृषभ | 6 | — | वक्री |
| शनि | कन्या | 10 | — | वक्री |
| राहु | वृश्चिक | 12 | — | मार्गी |
| केतु | वृश्चिक | 12 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: वृषभ
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | कन्या | 5 | — | मार्गी |
| चंद्र | सिंह | 4 | — | मार्गी |
| मंगल | कन्या | 5 | — | मार्गी |
| बुध | तुला | 6 | — | वक्री |
| गुरु | सिंह | 4 | — | मार्गी |
| शुक्र | वृश्चिक | 7 | — | वक्री |
| शनि | मेष | 12 | — | वक्री · नीच |
| राहु | वृश्चिक | 7 | — | मार्गी |
| केतु | वृश्चिक | 7 | — | मार्गी |
कुंडली की तालिका देखें
लग्न: सिंह
| ग्रह | राशि | भाव | अंश | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | कुंभ | 7 | — | मार्गी |
| चंद्र | मीन | 8 | — | मार्गी |
| मंगल | तुला | 3 | — | मार्गी |
| बुध | मीन | 8 | — | वक्री · नीच |
| गुरु | सिंह | 1 | — | मार्गी |
| शुक्र | मेष | 9 | — | वक्री |
| शनि | वृषभ | 10 | — | वक्री |
| राहु | तुला | 3 | — | मार्गी |
| केतु | मेष | 9 | — | मार्गी |
| कुंडली | लग्न | सूर्य | चंद्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु | केतु |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| D1 | सिंह | कर्क | तुला | सिंह | सिंह | सिंह | सिंह | मकर | धनु | मिथुन |
| D2 | सिंह | सिंह | सिंह | कर्क | सिंह | सिंह | सिंह | कर्क | कर्क | कर्क |
| D3 | सिंह | मीन | तुला | मेष | सिंह | सिंह | धनु | मकर | सिंह | कुंभ |
| D4 | सिंह | मेष | तुला | वृषभ | वृश्चिक | सिंह | वृश्चिक | मेष | कन्या | मीन |
| D7 | कन्या | कर्क | तुला | मकर | तुला | सिंह | तुला | सिंह | वृषभ | वृश्चिक |
| D9 | वृषभ | मीन | तुला | वृश्चिक | मिथुन | मेष | कर्क | मीन | वृश्चिक | वृषभ |
| D10 | तुला | धनु | तुला | मेष | वृश्चिक | सिंह | वृश्चिक | वृश्चिक | कर्क | मकर |
| D12 | तुला | मिथुन | वृश्चिक | मिथुन | वृश्चिक | सिंह | धनु | मेष | कन्या | मीन |
| D16 | वृश्चिक | मिथुन | वृषभ | कन्या | मकर | सिंह | मकर | सिंह | धनु | धनु |
| D20 | मेष | तुला | वृषभ | मेष | मिथुन | धनु | मिथुन | कन्या | वृश्चिक | वृश्चिक |
| D24 | मकर | वृषभ | तुला | मेष | मीन | सिंह | मेष | मकर | कुंभ | कुंभ |
| D27 | कन्या | कुंभ | धनु | कुंभ | धनु | मेष | मकर | कुंभ | मकर | कर्क |
| D30 | कुंभ | वृश्चिक | मेष | तुला | कुंभ | मेष | धनु | कन्या | मिथुन | मिथुन |
| D40 | धनु | वृश्चिक | कर्क | मकर | वृषभ | मेष | वृषभ | कन्या | वृश्चिक | वृश्चिक |
| D45 | वृषभ | कन्या | सिंह | कन्या | तुला | सिंह | वृश्चिक | मेष | वृश्चिक | वृश्चिक |
| D60 | सिंह | कुंभ | मीन | तुला | मीन | सिंह | मेष | वृषभ | तुला | मेष |
अष्टकवर्ग
राशियाँ मेष से गिनी गई हैं। जिस राशि में ग्रह के अधिक बिंदु हों, वहाँ गोचर में वह बेहतर फल देता है; 28 या अधिक सर्वाष्टकवर्ग बिंदु पारंपरिक रूप से बलवान हैं।
| ग्रह | मेष | वृषभ | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुंभ | मीन | कुल |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | 5 | 4 | 4 | 6 | 4 | 2 | 4 | 3 | 3 | 6 | 4 | 3 | 48 |
| चंद्र | 4 | 7 | 6 | 2 | 3 | 2 | 5 | 4 | 5 | 3 | 4 | 4 | 49 |
| मंगल | 2 | 4 | 5 | 3 | 4 | 3 | 3 | 3 | 3 | 5 | 1 | 3 | 39 |
| बुध | 4 | 5 | 6 | 4 | 6 | 4 | 3 | 6 | 3 | 5 | 2 | 6 | 54 |
| गुरु | 5 | 7 | 7 | 1 | 6 | 6 | 2 | 5 | 4 | 4 | 5 | 4 | 56 |
| शुक्र | 6 | 5 | 7 | 1 | 4 | 4 | 6 | 4 | 6 | 3 | 2 | 4 | 52 |
| शनि | 2 | 5 | 6 | 5 | 3 | 0 | 3 | 2 | 3 | 6 | 1 | 3 | 39 |
| सर्वाष्टकवर्ग | 28 | 37 | 41 | 22 | 30 | 21 | 26 | 27 | 27 | 32 | 19 | 27 | 337 |
विंशोत्तरी दशा
सभी महादशाएँ और उनकी अंतर्दशाएँ। पहली महादशा जन्म के समय की शेष दशा है, इसलिए उसकी पहले की अंतर्दशाएँ नहीं दी गईं।
| महादशा | से | तक |
|---|---|---|
| मंगल | 15 अग॰ 1991 | 25 अग॰ 1993 |
| राहु | 25 अग॰ 1993 | 26 अग॰ 2011 |
| गुरु ✦ | 26 अग॰ 2011 | 26 अग॰ 2027 |
| शनि | 26 अग॰ 2027 | 26 अग॰ 2046 |
| बुध | 26 अग॰ 2046 | 26 अग॰ 2063 |
| केतु | 26 अग॰ 2063 | 26 अग॰ 2070 |
| शुक्र | 26 अग॰ 2070 | 26 अग॰ 2090 |
| सूर्य | 26 अग॰ 2090 | 25 अग॰ 2096 |
| चंद्र | 25 अग॰ 2096 | 27 अग॰ 2106 |
| मंगल | 27 अग॰ 2106 | 26 अग॰ 2113 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| शुक्र | 20 जुल॰ 1991 | 18 सित॰ 1992 |
| सूर्य | 18 सित॰ 1992 | 24 जन॰ 1993 |
| चंद्र | 24 जन॰ 1993 | 25 अग॰ 1993 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| राहु | 25 अग॰ 1993 | 8 मई 1996 |
| गुरु | 8 मई 1996 | 1 अक्टू॰ 1998 |
| शनि | 1 अक्टू॰ 1998 | 7 अग॰ 2001 |
| बुध | 7 अग॰ 2001 | 25 फ़र॰ 2004 |
| केतु | 25 फ़र॰ 2004 | 14 मार्च 2005 |
| शुक्र | 14 मार्च 2005 | 14 मार्च 2008 |
| सूर्य | 14 मार्च 2008 | 6 फ़र॰ 2009 |
| चंद्र | 6 फ़र॰ 2009 | 7 अग॰ 2010 |
| मंगल | 7 अग॰ 2010 | 26 अग॰ 2011 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| गुरु | 26 अग॰ 2011 | 13 अक्टू॰ 2013 |
| शनि | 13 अक्टू॰ 2013 | 25 अप्रैल 2016 |
| बुध | 25 अप्रैल 2016 | 1 अग॰ 2018 |
| केतु | 1 अग॰ 2018 | 8 जुल॰ 2019 |
| शुक्र | 8 जुल॰ 2019 | 8 मार्च 2022 |
| सूर्य | 8 मार्च 2022 | 25 दिस॰ 2022 |
| चंद्र | 25 दिस॰ 2022 | 25 अप्रैल 2024 |
| मंगल | 25 अप्रैल 2024 | 1 अप्रैल 2025 |
| राहु ✦ | 1 अप्रैल 2025 | 26 अग॰ 2027 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| शनि | 26 अग॰ 2027 | 29 अग॰ 2030 |
| बुध | 29 अग॰ 2030 | 8 मई 2033 |
| केतु | 8 मई 2033 | 17 जून 2034 |
| शुक्र | 17 जून 2034 | 16 अग॰ 2037 |
| सूर्य | 16 अग॰ 2037 | 29 जुल॰ 2038 |
| चंद्र | 29 जुल॰ 2038 | 28 फ़र॰ 2040 |
| मंगल | 28 फ़र॰ 2040 | 7 अप्रैल 2041 |
| राहु | 7 अप्रैल 2041 | 12 फ़र॰ 2044 |
| गुरु | 12 फ़र॰ 2044 | 26 अग॰ 2046 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| बुध | 26 अग॰ 2046 | 21 जन॰ 2049 |
| केतु | 21 जन॰ 2049 | 18 जन॰ 2050 |
| शुक्र | 18 जन॰ 2050 | 18 नव॰ 2052 |
| सूर्य | 18 नव॰ 2052 | 25 सित॰ 2053 |
| चंद्र | 25 सित॰ 2053 | 24 फ़र॰ 2055 |
| मंगल | 24 फ़र॰ 2055 | 21 फ़र॰ 2056 |
| राहु | 21 फ़र॰ 2056 | 10 सित॰ 2058 |
| गुरु | 10 सित॰ 2058 | 16 दिस॰ 2060 |
| शनि | 16 दिस॰ 2060 | 26 अग॰ 2063 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| केतु | 26 अग॰ 2063 | 22 जन॰ 2064 |
| शुक्र | 22 जन॰ 2064 | 23 मार्च 2065 |
| सूर्य | 23 मार्च 2065 | 29 जुल॰ 2065 |
| चंद्र | 29 जुल॰ 2065 | 27 फ़र॰ 2066 |
| मंगल | 27 फ़र॰ 2066 | 26 जुल॰ 2066 |
| राहु | 26 जुल॰ 2066 | 14 अग॰ 2067 |
| गुरु | 14 अग॰ 2067 | 20 जुल॰ 2068 |
| शनि | 20 जुल॰ 2068 | 28 अग॰ 2069 |
| बुध | 28 अग॰ 2069 | 26 अग॰ 2070 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| शुक्र | 26 अग॰ 2070 | 25 दिस॰ 2073 |
| सूर्य | 25 दिस॰ 2073 | 25 दिस॰ 2074 |
| चंद्र | 25 दिस॰ 2074 | 25 अग॰ 2076 |
| मंगल | 25 अग॰ 2076 | 25 अक्टू॰ 2077 |
| राहु | 25 अक्टू॰ 2077 | 25 अक्टू॰ 2080 |
| गुरु | 25 अक्टू॰ 2080 | 26 जून 2083 |
| शनि | 26 जून 2083 | 26 अग॰ 2086 |
| बुध | 26 अग॰ 2086 | 26 जून 2089 |
| केतु | 26 जून 2089 | 26 अग॰ 2090 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| सूर्य | 26 अग॰ 2090 | 13 दिस॰ 2090 |
| चंद्र | 13 दिस॰ 2090 | 14 जून 2091 |
| मंगल | 14 जून 2091 | 20 अक्टू॰ 2091 |
| राहु | 20 अक्टू॰ 2091 | 12 सित॰ 2092 |
| गुरु | 12 सित॰ 2092 | 2 जुल॰ 2093 |
| शनि | 2 जुल॰ 2093 | 14 जून 2094 |
| बुध | 14 जून 2094 | 20 अप्रैल 2095 |
| केतु | 20 अप्रैल 2095 | 26 अग॰ 2095 |
| शुक्र | 26 अग॰ 2095 | 25 अग॰ 2096 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| चंद्र | 25 अग॰ 2096 | 26 जून 2097 |
| मंगल | 26 जून 2097 | 25 जन॰ 2098 |
| राहु | 25 जन॰ 2098 | 26 जुल॰ 2099 |
| गुरु | 26 जुल॰ 2099 | 25 नव॰ 2100 |
| शनि | 25 नव॰ 2100 | 27 जून 2102 |
| बुध | 27 जून 2102 | 26 नव॰ 2103 |
| केतु | 26 नव॰ 2103 | 26 जून 2104 |
| शुक्र | 26 जून 2104 | 25 फ़र॰ 2106 |
| सूर्य | 25 फ़र॰ 2106 | 27 अग॰ 2106 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| मंगल | 27 अग॰ 2106 | 23 जन॰ 2107 |
| राहु | 23 जन॰ 2107 | 10 फ़र॰ 2108 |
| गुरु | 10 फ़र॰ 2108 | 16 जन॰ 2109 |
| शनि | 16 जन॰ 2109 | 25 फ़र॰ 2110 |
| बुध | 25 फ़र॰ 2110 | 22 फ़र॰ 2111 |
| केतु | 22 फ़र॰ 2111 | 21 जुल॰ 2111 |
| शुक्र | 21 जुल॰ 2111 | 19 सित॰ 2112 |
| सूर्य | 19 सित॰ 2112 | 25 जन॰ 2113 |
| चंद्र | 25 जन॰ 2113 | 26 अग॰ 2113 |
प्रत्यंतर दशा: गुरु
गुरु महादशा की प्रत्यंतर दशाएँ।
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| गुरु | 26 अग॰ 2011 | 8 दिस॰ 2011 |
| शनि | 8 दिस॰ 2011 | 9 अप्रैल 2012 |
| बुध | 9 अप्रैल 2012 | 29 जुल॰ 2012 |
| केतु | 29 जुल॰ 2012 | 12 सित॰ 2012 |
| शुक्र | 12 सित॰ 2012 | 20 जन॰ 2013 |
| सूर्य | 20 जन॰ 2013 | 28 फ़र॰ 2013 |
| चंद्र | 28 फ़र॰ 2013 | 4 मई 2013 |
| मंगल | 4 मई 2013 | 18 जून 2013 |
| राहु | 18 जून 2013 | 13 अक्टू॰ 2013 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| शनि | 13 अक्टू॰ 2013 | 9 मार्च 2014 |
| बुध | 9 मार्च 2014 | 18 जुल॰ 2014 |
| केतु | 18 जुल॰ 2014 | 10 सित॰ 2014 |
| शुक्र | 10 सित॰ 2014 | 11 फ़र॰ 2015 |
| सूर्य | 11 फ़र॰ 2015 | 29 मार्च 2015 |
| चंद्र | 29 मार्च 2015 | 14 जून 2015 |
| मंगल | 14 जून 2015 | 7 अग॰ 2015 |
| राहु | 7 अग॰ 2015 | 24 दिस॰ 2015 |
| गुरु | 24 दिस॰ 2015 | 25 अप्रैल 2016 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| बुध | 25 अप्रैल 2016 | 21 अग॰ 2016 |
| केतु | 21 अग॰ 2016 | 8 अक्टू॰ 2016 |
| शुक्र | 8 अक्टू॰ 2016 | 23 फ़र॰ 2017 |
| सूर्य | 23 फ़र॰ 2017 | 5 अप्रैल 2017 |
| चंद्र | 5 अप्रैल 2017 | 13 जून 2017 |
| मंगल | 13 जून 2017 | 1 अग॰ 2017 |
| राहु | 1 अग॰ 2017 | 3 दिस॰ 2017 |
| गुरु | 3 दिस॰ 2017 | 23 मार्च 2018 |
| शनि | 23 मार्च 2018 | 1 अग॰ 2018 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| केतु | 1 अग॰ 2018 | 21 अग॰ 2018 |
| शुक्र | 21 अग॰ 2018 | 17 अक्टू॰ 2018 |
| सूर्य | 17 अक्टू॰ 2018 | 3 नव॰ 2018 |
| चंद्र | 3 नव॰ 2018 | 1 दिस॰ 2018 |
| मंगल | 1 दिस॰ 2018 | 21 दिस॰ 2018 |
| राहु | 21 दिस॰ 2018 | 10 फ़र॰ 2019 |
| गुरु | 10 फ़र॰ 2019 | 28 मार्च 2019 |
| शनि | 28 मार्च 2019 | 21 मई 2019 |
| बुध | 21 मई 2019 | 8 जुल॰ 2019 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| शुक्र | 8 जुल॰ 2019 | 18 दिस॰ 2019 |
| सूर्य | 18 दिस॰ 2019 | 4 फ़र॰ 2020 |
| चंद्र | 4 फ़र॰ 2020 | 25 अप्रैल 2020 |
| मंगल | 25 अप्रैल 2020 | 21 जून 2020 |
| राहु | 21 जून 2020 | 14 नव॰ 2020 |
| गुरु | 14 नव॰ 2020 | 24 मार्च 2021 |
| शनि | 24 मार्च 2021 | 25 अग॰ 2021 |
| बुध | 25 अग॰ 2021 | 10 जन॰ 2022 |
| केतु | 10 जन॰ 2022 | 8 मार्च 2022 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| सूर्य | 8 मार्च 2022 | 23 मार्च 2022 |
| चंद्र | 23 मार्च 2022 | 16 अप्रैल 2022 |
| मंगल | 16 अप्रैल 2022 | 3 मई 2022 |
| राहु | 3 मई 2022 | 16 जून 2022 |
| गुरु | 16 जून 2022 | 25 जुल॰ 2022 |
| शनि | 25 जुल॰ 2022 | 9 सित॰ 2022 |
| बुध | 9 सित॰ 2022 | 21 अक्टू॰ 2022 |
| केतु | 21 अक्टू॰ 2022 | 7 नव॰ 2022 |
| शुक्र | 7 नव॰ 2022 | 25 दिस॰ 2022 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| चंद्र | 25 दिस॰ 2022 | 4 फ़र॰ 2023 |
| मंगल | 4 फ़र॰ 2023 | 4 मार्च 2023 |
| राहु | 4 मार्च 2023 | 16 मई 2023 |
| गुरु | 16 मई 2023 | 20 जुल॰ 2023 |
| शनि | 20 जुल॰ 2023 | 5 अक्टू॰ 2023 |
| बुध | 5 अक्टू॰ 2023 | 13 दिस॰ 2023 |
| केतु | 13 दिस॰ 2023 | 11 जन॰ 2024 |
| शुक्र | 11 जन॰ 2024 | 1 अप्रैल 2024 |
| सूर्य | 1 अप्रैल 2024 | 25 अप्रैल 2024 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| मंगल | 25 अप्रैल 2024 | 15 मई 2024 |
| राहु | 15 मई 2024 | 5 जुल॰ 2024 |
| गुरु | 5 जुल॰ 2024 | 20 अग॰ 2024 |
| शनि | 20 अग॰ 2024 | 13 अक्टू॰ 2024 |
| बुध | 13 अक्टू॰ 2024 | 30 नव॰ 2024 |
| केतु | 30 नव॰ 2024 | 20 दिस॰ 2024 |
| शुक्र | 20 दिस॰ 2024 | 15 फ़र॰ 2025 |
| सूर्य | 15 फ़र॰ 2025 | 4 मार्च 2025 |
| चंद्र | 4 मार्च 2025 | 1 अप्रैल 2025 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| राहु | 1 अप्रैल 2025 | 11 अग॰ 2025 |
| गुरु | 11 अग॰ 2025 | 6 दिस॰ 2025 |
| शनि | 6 दिस॰ 2025 | 23 अप्रैल 2026 |
| बुध | 23 अप्रैल 2026 | 26 अग॰ 2026 |
| केतु ✦ | 26 अग॰ 2026 | 16 अक्टू॰ 2026 |
| शुक्र | 16 अक्टू॰ 2026 | 11 मार्च 2027 |
| सूर्य | 11 मार्च 2027 | 24 अप्रैल 2027 |
| चंद्र | 24 अप्रैल 2027 | 6 जुल॰ 2027 |
| मंगल | 6 जुल॰ 2027 | 26 अग॰ 2027 |
प्रत्यंतर दशा: शनि
शनि महादशा की प्रत्यंतर दशाएँ।
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| शनि | 26 अग॰ 2027 | 16 फ़र॰ 2028 |
| बुध | 16 फ़र॰ 2028 | 21 जुल॰ 2028 |
| केतु | 21 जुल॰ 2028 | 23 सित॰ 2028 |
| शुक्र | 23 सित॰ 2028 | 25 मार्च 2029 |
| सूर्य | 25 मार्च 2029 | 19 मई 2029 |
| चंद्र | 19 मई 2029 | 18 अग॰ 2029 |
| मंगल | 18 अग॰ 2029 | 21 अक्टू॰ 2029 |
| राहु | 21 अक्टू॰ 2029 | 4 अप्रैल 2030 |
| गुरु | 4 अप्रैल 2030 | 29 अग॰ 2030 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| बुध | 29 अग॰ 2030 | 15 जन॰ 2031 |
| केतु | 15 जन॰ 2031 | 13 मार्च 2031 |
| शुक्र | 13 मार्च 2031 | 24 अग॰ 2031 |
| सूर्य | 24 अग॰ 2031 | 12 अक्टू॰ 2031 |
| चंद्र | 12 अक्टू॰ 2031 | 2 जन॰ 2032 |
| मंगल | 2 जन॰ 2032 | 29 फ़र॰ 2032 |
| राहु | 29 फ़र॰ 2032 | 25 जुल॰ 2032 |
| गुरु | 25 जुल॰ 2032 | 3 दिस॰ 2032 |
| शनि | 3 दिस॰ 2032 | 8 मई 2033 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| केतु | 8 मई 2033 | 31 मई 2033 |
| शुक्र | 31 मई 2033 | 7 अग॰ 2033 |
| सूर्य | 7 अग॰ 2033 | 27 अग॰ 2033 |
| चंद्र | 27 अग॰ 2033 | 30 सित॰ 2033 |
| मंगल | 30 सित॰ 2033 | 23 अक्टू॰ 2033 |
| राहु | 23 अक्टू॰ 2033 | 23 दिस॰ 2033 |
| गुरु | 23 दिस॰ 2033 | 15 फ़र॰ 2034 |
| शनि | 15 फ़र॰ 2034 | 20 अप्रैल 2034 |
| बुध | 20 अप्रैल 2034 | 17 जून 2034 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| शुक्र | 17 जून 2034 | 26 दिस॰ 2034 |
| सूर्य | 26 दिस॰ 2034 | 22 फ़र॰ 2035 |
| चंद्र | 22 फ़र॰ 2035 | 30 मई 2035 |
| मंगल | 30 मई 2035 | 5 अग॰ 2035 |
| राहु | 5 अग॰ 2035 | 26 जन॰ 2036 |
| गुरु | 26 जन॰ 2036 | 28 जून 2036 |
| शनि | 28 जून 2036 | 28 दिस॰ 2036 |
| बुध | 28 दिस॰ 2036 | 10 जून 2037 |
| केतु | 10 जून 2037 | 16 अग॰ 2037 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| सूर्य | 16 अग॰ 2037 | 3 सित॰ 2037 |
| चंद्र | 3 सित॰ 2037 | 2 अक्टू॰ 2037 |
| मंगल | 2 अक्टू॰ 2037 | 22 अक्टू॰ 2037 |
| राहु | 22 अक्टू॰ 2037 | 13 दिस॰ 2037 |
| गुरु | 13 दिस॰ 2037 | 28 जन॰ 2038 |
| शनि | 28 जन॰ 2038 | 24 मार्च 2038 |
| बुध | 24 मार्च 2038 | 12 मई 2038 |
| केतु | 12 मई 2038 | 1 जून 2038 |
| शुक्र | 1 जून 2038 | 29 जुल॰ 2038 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| चंद्र | 29 जुल॰ 2038 | 15 सित॰ 2038 |
| मंगल | 15 सित॰ 2038 | 19 अक्टू॰ 2038 |
| राहु | 19 अक्टू॰ 2038 | 14 जन॰ 2039 |
| गुरु | 14 जन॰ 2039 | 1 अप्रैल 2039 |
| शनि | 1 अप्रैल 2039 | 2 जुल॰ 2039 |
| बुध | 2 जुल॰ 2039 | 22 सित॰ 2039 |
| केतु | 22 सित॰ 2039 | 25 अक्टू॰ 2039 |
| शुक्र | 25 अक्टू॰ 2039 | 30 जन॰ 2040 |
| सूर्य | 30 जन॰ 2040 | 28 फ़र॰ 2040 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| मंगल | 28 फ़र॰ 2040 | 22 मार्च 2040 |
| राहु | 22 मार्च 2040 | 22 मई 2040 |
| गुरु | 22 मई 2040 | 15 जुल॰ 2040 |
| शनि | 15 जुल॰ 2040 | 17 सित॰ 2040 |
| बुध | 17 सित॰ 2040 | 13 नव॰ 2040 |
| केतु | 13 नव॰ 2040 | 7 दिस॰ 2040 |
| शुक्र | 7 दिस॰ 2040 | 12 फ़र॰ 2041 |
| सूर्य | 12 फ़र॰ 2041 | 5 मार्च 2041 |
| चंद्र | 5 मार्च 2041 | 7 अप्रैल 2041 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| राहु | 7 अप्रैल 2041 | 11 सित॰ 2041 |
| गुरु | 11 सित॰ 2041 | 27 जन॰ 2042 |
| शनि | 27 जन॰ 2042 | 11 जुल॰ 2042 |
| बुध | 11 जुल॰ 2042 | 6 दिस॰ 2042 |
| केतु | 6 दिस॰ 2042 | 4 फ़र॰ 2043 |
| शुक्र | 4 फ़र॰ 2043 | 28 जुल॰ 2043 |
| सूर्य | 28 जुल॰ 2043 | 18 सित॰ 2043 |
| चंद्र | 18 सित॰ 2043 | 14 दिस॰ 2043 |
| मंगल | 14 दिस॰ 2043 | 12 फ़र॰ 2044 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| गुरु | 12 फ़र॰ 2044 | 15 जून 2044 |
| शनि | 15 जून 2044 | 8 नव॰ 2044 |
| बुध | 8 नव॰ 2044 | 19 मार्च 2045 |
| केतु | 19 मार्च 2045 | 12 मई 2045 |
| शुक्र | 12 मई 2045 | 14 अक्टू॰ 2045 |
| सूर्य | 14 अक्टू॰ 2045 | 29 नव॰ 2045 |
| चंद्र | 29 नव॰ 2045 | 14 फ़र॰ 2046 |
| मंगल | 14 फ़र॰ 2046 | 9 अप्रैल 2046 |
| राहु | 9 अप्रैल 2046 | 26 अग॰ 2046 |
योगिनी दशा
जन्म नक्षत्र से 1 से 8 वर्ष की आठ योगिनियाँ। हर तालिका एक योगिनी दशा और उसकी अंतर्दशाएँ देती है।
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| सिद्धा | 15 अग॰ 1991 | 8 सित॰ 1991 |
| संकटा | 8 सित॰ 1991 | 29 नव॰ 1991 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| पिंगला | 29 नव॰ 1991 | 8 जन॰ 1992 |
| धान्या | 8 जन॰ 1992 | 9 मार्च 1992 |
| भ्रामरी | 9 मार्च 1992 | 29 मई 1992 |
| भद्रिका | 29 मई 1992 | 8 सित॰ 1992 |
| उल्का | 8 सित॰ 1992 | 7 जन॰ 1993 |
| सिद्धा | 7 जन॰ 1993 | 29 मई 1993 |
| संकटा | 29 मई 1993 | 8 नव॰ 1993 |
| मंगला | 8 नव॰ 1993 | 28 नव॰ 1993 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| धान्या | 28 नव॰ 1993 | 27 फ़र॰ 1994 |
| भ्रामरी | 27 फ़र॰ 1994 | 29 जून 1994 |
| भद्रिका | 29 जून 1994 | 28 नव॰ 1994 |
| उल्का | 28 नव॰ 1994 | 30 मई 1995 |
| सिद्धा | 30 मई 1995 | 29 दिस॰ 1995 |
| संकटा | 29 दिस॰ 1995 | 28 अग॰ 1996 |
| मंगला | 28 अग॰ 1996 | 28 सित॰ 1996 |
| पिंगला | 28 सित॰ 1996 | 28 नव॰ 1996 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| भ्रामरी | 28 नव॰ 1996 | 9 मई 1997 |
| भद्रिका | 9 मई 1997 | 28 नव॰ 1997 |
| उल्का | 28 नव॰ 1997 | 30 जुल॰ 1998 |
| सिद्धा | 30 जुल॰ 1998 | 10 मई 1999 |
| संकटा | 10 मई 1999 | 29 मार्च 2000 |
| मंगला | 29 मार्च 2000 | 9 मई 2000 |
| पिंगला | 9 मई 2000 | 29 जुल॰ 2000 |
| धान्या | 29 जुल॰ 2000 | 28 नव॰ 2000 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| भद्रिका | 28 नव॰ 2000 | 8 अग॰ 2001 |
| उल्का | 8 अग॰ 2001 | 9 जून 2002 |
| सिद्धा | 9 जून 2002 | 30 मई 2003 |
| संकटा | 30 मई 2003 | 9 जुल॰ 2004 |
| मंगला | 9 जुल॰ 2004 | 28 अग॰ 2004 |
| पिंगला | 28 अग॰ 2004 | 8 दिस॰ 2004 |
| धान्या | 8 दिस॰ 2004 | 9 मई 2005 |
| भ्रामरी | 9 मई 2005 | 28 नव॰ 2005 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| उल्का | 28 नव॰ 2005 | 28 नव॰ 2006 |
| सिद्धा | 28 नव॰ 2006 | 28 जन॰ 2008 |
| संकटा | 28 जन॰ 2008 | 29 मई 2009 |
| मंगला | 29 मई 2009 | 29 जुल॰ 2009 |
| पिंगला | 29 जुल॰ 2009 | 28 नव॰ 2009 |
| धान्या | 28 नव॰ 2009 | 30 मई 2010 |
| भ्रामरी | 30 मई 2010 | 28 जन॰ 2011 |
| भद्रिका | 28 जन॰ 2011 | 29 नव॰ 2011 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| सिद्धा | 29 नव॰ 2011 | 9 अप्रैल 2013 |
| संकटा | 9 अप्रैल 2013 | 29 अक्टू॰ 2014 |
| मंगला | 29 अक्टू॰ 2014 | 8 जन॰ 2015 |
| पिंगला | 8 जन॰ 2015 | 30 मई 2015 |
| धान्या | 30 मई 2015 | 29 दिस॰ 2015 |
| भ्रामरी | 29 दिस॰ 2015 | 8 अक्टू॰ 2016 |
| भद्रिका | 8 अक्टू॰ 2016 | 28 सित॰ 2017 |
| उल्का | 28 सित॰ 2017 | 28 नव॰ 2018 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| संकटा | 28 नव॰ 2018 | 8 सित॰ 2020 |
| मंगला | 8 सित॰ 2020 | 28 नव॰ 2020 |
| पिंगला | 28 नव॰ 2020 | 9 मई 2021 |
| धान्या | 9 मई 2021 | 8 जन॰ 2022 |
| भ्रामरी | 8 जन॰ 2022 | 28 नव॰ 2022 |
| भद्रिका | 28 नव॰ 2022 | 8 जन॰ 2024 |
| उल्का | 8 जन॰ 2024 | 9 मई 2025 |
| सिद्धा ✦ | 9 मई 2025 | 28 नव॰ 2026 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| मंगला | 28 नव॰ 2026 | 8 दिस॰ 2026 |
| पिंगला | 8 दिस॰ 2026 | 29 दिस॰ 2026 |
| धान्या | 29 दिस॰ 2026 | 28 जन॰ 2027 |
| भ्रामरी | 28 जन॰ 2027 | 10 मार्च 2027 |
| भद्रिका | 10 मार्च 2027 | 29 अप्रैल 2027 |
| उल्का | 29 अप्रैल 2027 | 29 जून 2027 |
| सिद्धा | 29 जून 2027 | 8 सित॰ 2027 |
| संकटा | 8 सित॰ 2027 | 29 नव॰ 2027 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| पिंगला | 29 नव॰ 2027 | 8 जन॰ 2028 |
| धान्या | 8 जन॰ 2028 | 9 मार्च 2028 |
| भ्रामरी | 9 मार्च 2028 | 29 मई 2028 |
| भद्रिका | 29 मई 2028 | 8 सित॰ 2028 |
| उल्का | 8 सित॰ 2028 | 7 जन॰ 2029 |
| सिद्धा | 7 जन॰ 2029 | 29 मई 2029 |
| संकटा | 29 मई 2029 | 8 नव॰ 2029 |
| मंगला | 8 नव॰ 2029 | 28 नव॰ 2029 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| धान्या | 28 नव॰ 2029 | 27 फ़र॰ 2030 |
| भ्रामरी | 27 फ़र॰ 2030 | 29 जून 2030 |
| भद्रिका | 29 जून 2030 | 28 नव॰ 2030 |
| उल्का | 28 नव॰ 2030 | 30 मई 2031 |
| सिद्धा | 30 मई 2031 | 29 दिस॰ 2031 |
| संकटा | 29 दिस॰ 2031 | 28 अग॰ 2032 |
| मंगला | 28 अग॰ 2032 | 28 सित॰ 2032 |
| पिंगला | 28 सित॰ 2032 | 28 नव॰ 2032 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| भ्रामरी | 28 नव॰ 2032 | 9 मई 2033 |
| भद्रिका | 9 मई 2033 | 28 नव॰ 2033 |
| उल्का | 28 नव॰ 2033 | 30 जुल॰ 2034 |
| सिद्धा | 30 जुल॰ 2034 | 10 मई 2035 |
| संकटा | 10 मई 2035 | 29 मार्च 2036 |
| मंगला | 29 मार्च 2036 | 9 मई 2036 |
| पिंगला | 9 मई 2036 | 29 जुल॰ 2036 |
| धान्या | 29 जुल॰ 2036 | 28 नव॰ 2036 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| भद्रिका | 28 नव॰ 2036 | 8 अग॰ 2037 |
| उल्का | 8 अग॰ 2037 | 9 जून 2038 |
| सिद्धा | 9 जून 2038 | 30 मई 2039 |
| संकटा | 30 मई 2039 | 9 जुल॰ 2040 |
| मंगला | 9 जुल॰ 2040 | 28 अग॰ 2040 |
| पिंगला | 28 अग॰ 2040 | 8 दिस॰ 2040 |
| धान्या | 8 दिस॰ 2040 | 9 मई 2041 |
| भ्रामरी | 9 मई 2041 | 28 नव॰ 2041 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| उल्का | 28 नव॰ 2041 | 28 नव॰ 2042 |
| सिद्धा | 28 नव॰ 2042 | 28 जन॰ 2044 |
| संकटा | 28 जन॰ 2044 | 29 मई 2045 |
| मंगला | 29 मई 2045 | 29 जुल॰ 2045 |
| पिंगला | 29 जुल॰ 2045 | 28 नव॰ 2045 |
| धान्या | 28 नव॰ 2045 | 30 मई 2046 |
| भ्रामरी | 30 मई 2046 | 28 जन॰ 2047 |
| भद्रिका | 28 जन॰ 2047 | 29 नव॰ 2047 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| सिद्धा | 29 नव॰ 2047 | 9 अप्रैल 2049 |
| संकटा | 9 अप्रैल 2049 | 29 अक्टू॰ 2050 |
| मंगला | 29 अक्टू॰ 2050 | 8 जन॰ 2051 |
| पिंगला | 8 जन॰ 2051 | 30 मई 2051 |
| धान्या | 30 मई 2051 | 29 दिस॰ 2051 |
| भ्रामरी | 29 दिस॰ 2051 | 8 अक्टू॰ 2052 |
| भद्रिका | 8 अक्टू॰ 2052 | 28 सित॰ 2053 |
| उल्का | 28 सित॰ 2053 | 28 नव॰ 2054 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| संकटा | 28 नव॰ 2054 | 8 सित॰ 2056 |
| मंगला | 8 सित॰ 2056 | 28 नव॰ 2056 |
| पिंगला | 28 नव॰ 2056 | 9 मई 2057 |
| धान्या | 9 मई 2057 | 8 जन॰ 2058 |
| भ्रामरी | 8 जन॰ 2058 | 28 नव॰ 2058 |
| भद्रिका | 28 नव॰ 2058 | 8 जन॰ 2060 |
| उल्का | 8 जन॰ 2060 | 9 मई 2061 |
| सिद्धा | 9 मई 2061 | 28 नव॰ 2062 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| मंगला | 28 नव॰ 2062 | 8 दिस॰ 2062 |
| पिंगला | 8 दिस॰ 2062 | 29 दिस॰ 2062 |
| धान्या | 29 दिस॰ 2062 | 28 जन॰ 2063 |
| भ्रामरी | 28 जन॰ 2063 | 10 मार्च 2063 |
| भद्रिका | 10 मार्च 2063 | 29 अप्रैल 2063 |
| उल्का | 29 अप्रैल 2063 | 29 जून 2063 |
| सिद्धा | 29 जून 2063 | 8 सित॰ 2063 |
| संकटा | 8 सित॰ 2063 | 29 नव॰ 2063 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| पिंगला | 29 नव॰ 2063 | 8 जन॰ 2064 |
| धान्या | 8 जन॰ 2064 | 9 मार्च 2064 |
| भ्रामरी | 9 मार्च 2064 | 29 मई 2064 |
| भद्रिका | 29 मई 2064 | 8 सित॰ 2064 |
| उल्का | 8 सित॰ 2064 | 7 जन॰ 2065 |
| सिद्धा | 7 जन॰ 2065 | 29 मई 2065 |
| संकटा | 29 मई 2065 | 8 नव॰ 2065 |
| मंगला | 8 नव॰ 2065 | 28 नव॰ 2065 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| धान्या | 28 नव॰ 2065 | 27 फ़र॰ 2066 |
| भ्रामरी | 27 फ़र॰ 2066 | 29 जून 2066 |
| भद्रिका | 29 जून 2066 | 28 नव॰ 2066 |
| उल्का | 28 नव॰ 2066 | 30 मई 2067 |
| सिद्धा | 30 मई 2067 | 29 दिस॰ 2067 |
| संकटा | 29 दिस॰ 2067 | 28 अग॰ 2068 |
| मंगला | 28 अग॰ 2068 | 28 सित॰ 2068 |
| पिंगला | 28 सित॰ 2068 | 28 नव॰ 2068 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| भ्रामरी | 28 नव॰ 2068 | 9 मई 2069 |
| भद्रिका | 9 मई 2069 | 28 नव॰ 2069 |
| उल्का | 28 नव॰ 2069 | 30 जुल॰ 2070 |
| सिद्धा | 30 जुल॰ 2070 | 10 मई 2071 |
| संकटा | 10 मई 2071 | 29 मार्च 2072 |
| मंगला | 29 मार्च 2072 | 9 मई 2072 |
| पिंगला | 9 मई 2072 | 29 जुल॰ 2072 |
| धान्या | 29 जुल॰ 2072 | 28 नव॰ 2072 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| भद्रिका | 28 नव॰ 2072 | 8 अग॰ 2073 |
| उल्का | 8 अग॰ 2073 | 9 जून 2074 |
| सिद्धा | 9 जून 2074 | 30 मई 2075 |
| संकटा | 30 मई 2075 | 9 जुल॰ 2076 |
| मंगला | 9 जुल॰ 2076 | 28 अग॰ 2076 |
| पिंगला | 28 अग॰ 2076 | 8 दिस॰ 2076 |
| धान्या | 8 दिस॰ 2076 | 9 मई 2077 |
| भ्रामरी | 9 मई 2077 | 28 नव॰ 2077 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| उल्का | 28 नव॰ 2077 | 28 नव॰ 2078 |
| सिद्धा | 28 नव॰ 2078 | 28 जन॰ 2080 |
| संकटा | 28 जन॰ 2080 | 29 मई 2081 |
| मंगला | 29 मई 2081 | 29 जुल॰ 2081 |
| पिंगला | 29 जुल॰ 2081 | 28 नव॰ 2081 |
| धान्या | 28 नव॰ 2081 | 30 मई 2082 |
| भ्रामरी | 30 मई 2082 | 28 जन॰ 2083 |
| भद्रिका | 28 जन॰ 2083 | 29 नव॰ 2083 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| सिद्धा | 29 नव॰ 2083 | 9 अप्रैल 2085 |
| संकटा | 9 अप्रैल 2085 | 29 अक्टू॰ 2086 |
| मंगला | 29 अक्टू॰ 2086 | 8 जन॰ 2087 |
| पिंगला | 8 जन॰ 2087 | 30 मई 2087 |
| धान्या | 30 मई 2087 | 29 दिस॰ 2087 |
| भ्रामरी | 29 दिस॰ 2087 | 8 अक्टू॰ 2088 |
| भद्रिका | 8 अक्टू॰ 2088 | 28 सित॰ 2089 |
| उल्का | 28 सित॰ 2089 | 28 नव॰ 2090 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| संकटा | 28 नव॰ 2090 | 8 सित॰ 2092 |
| मंगला | 8 सित॰ 2092 | 28 नव॰ 2092 |
| पिंगला | 28 नव॰ 2092 | 9 मई 2093 |
| धान्या | 9 मई 2093 | 8 जन॰ 2094 |
| भ्रामरी | 8 जन॰ 2094 | 28 नव॰ 2094 |
| भद्रिका | 28 नव॰ 2094 | 8 जन॰ 2096 |
| उल्का | 8 जन॰ 2096 | 9 मई 2097 |
| सिद्धा | 9 मई 2097 | 28 नव॰ 2098 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| मंगला | 28 नव॰ 2098 | 8 दिस॰ 2098 |
| पिंगला | 8 दिस॰ 2098 | 29 दिस॰ 2098 |
| धान्या | 29 दिस॰ 2098 | 28 जन॰ 2099 |
| भ्रामरी | 28 जन॰ 2099 | 10 मार्च 2099 |
| भद्रिका | 10 मार्च 2099 | 29 अप्रैल 2099 |
| उल्का | 29 अप्रैल 2099 | 29 जून 2099 |
| सिद्धा | 29 जून 2099 | 8 सित॰ 2099 |
| संकटा | 8 सित॰ 2099 | 29 नव॰ 2099 |
| अंतर्दशा | से | तक |
|---|---|---|
| पिंगला | 29 नव॰ 2099 | 8 जन॰ 2100 |
| धान्या | 8 जन॰ 2100 | 10 मार्च 2100 |
| भ्रामरी | 10 मार्च 2100 | 30 मई 2100 |
| भद्रिका | 30 मई 2100 | 9 सित॰ 2100 |
| उल्का | 9 सित॰ 2100 | 8 जन॰ 2101 |
| सिद्धा | 8 जन॰ 2101 | 30 मई 2101 |
| संकटा | 30 मई 2101 | 9 नव॰ 2101 |
| मंगला | 9 नव॰ 2101 | 29 नव॰ 2101 |
KP (कृष्णमूर्ति) भाव संधि और कारक
प्लेसिडस भाव संधियाँ, नक्षत्र और उप स्वामी तथा कारक केपी (कृष्णमूर्ति) अयनांश से हैं। ग्रह संधि से संधि तक रखे गए हैं।
केपी (कृष्णमूर्ति) अयनांश: 23°40′05″
| भाव संधि | भोगांश | राशि | अंश | राशि स्वामी | नक्षत्र स्वामी | उप स्वामी |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | 126°23′18″ | सिंह | 6°23′18″ | सूर्य | केतु | राहु |
| 2 | 152°45′34″ | कन्या | 2°45′34″ | बुध | सूर्य | गुरु |
| 3 | 182°44′30″ | तुला | 2°44′30″ | शुक्र | मंगल | शुक्र |
| 4 | 214°48′48″ | वृश्चिक | 4°48′48″ | मंगल | शनि | शनि |
| 5 | 246°46′16″ | धनु | 6°46′16″ | गुरु | केतु | राहु |
| 6 | 277°24′52″ | मकर | 7°24′52″ | शनि | सूर्य | केतु |
| 7 | 306°23′18″ | कुंभ | 6°23′18″ | शनि | मंगल | चंद्र |
| 8 | 332°45′34″ | मीन | 2°45′34″ | गुरु | गुरु | राहु |
| 9 | 2°44′30″ | मेष | 2°44′30″ | मंगल | केतु | शुक्र |
| 10 | 34°48′48″ | वृषभ | 4°48′48″ | शुक्र | सूर्य | शनि |
| 11 | 66°46′16″ | मिथुन | 6°46′16″ | बुध | राहु | राहु |
| 12 | 97°24′52″ | कर्क | 7°24′52″ | चंद्र | शनि | केतु |
| भाव | A: स्थित ग्रहों के नक्षत्र में | B: स्थित ग्रह | C: स्वामी के नक्षत्र में | D: स्वामी |
|---|---|---|---|---|
| 1 | सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु | मंगल, बुध, शुक्र | शनि | सूर्य |
| 2 | — | — | सूर्य | बुध |
| 3 | — | चंद्र | मंगल, राहु | शुक्र |
| 4 | — | — | चंद्र | मंगल |
| 5 | — | राहु | केतु | गुरु |
| 6 | — | शनि | — | शनि |
| 7 | — | — | — | शनि |
| 8 | — | — | केतु | गुरु |
| 9 | — | — | चंद्र | मंगल |
| 10 | — | — | मंगल, राहु | शुक्र |
| 11 | बुध, गुरु, शुक्र | केतु | सूर्य | बुध |
| 12 | शनि, केतु | सूर्य, गुरु | — | चंद्र |
| ग्रह | नक्षत्र स्वामी | A: नक्षत्र स्वामी के भाव | B: स्थित भाव | C: नक्षत्र स्वामी के स्वामित्व वाले | D: स्वामित्व वाले भाव |
|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | बुध | 1 | 12 | 2, 11 | 1 |
| चंद्र | मंगल | 1 | 3 | 4, 9 | 12 |
| मंगल | शुक्र | 1 | 1 | 3, 10 | 4, 9 |
| बुध | केतु | 11 | 1 | — | 2, 11 |
| गुरु | केतु | 11 | 12 | — | 5, 8 |
| शुक्र | केतु | 11 | 1 | — | 3, 10 |
| शनि | सूर्य | 12 | 6 | 1 | 6, 7 |
| राहु | शुक्र | 1 | 5 | 3, 10 | — |
| केतु | गुरु | 12 | 11 | 5, 8 | — |
गोचर तालिकाएँ (अगले दस वर्ष)
लग्न · चंद्र से भाव
| राशि | लग्न · चंद्र से भाव | से | तक |
|---|---|---|---|
| मीन | 8 · 6 | 30 सित॰ 2026 | 3 जून 2027 |
| मेष | 9 · 7 | 3 जून 2027 | 20 अक्टू॰ 2027 |
| मीन | 8 · 6 | 20 अक्टू॰ 2027 | 23 फ़र॰ 2028 |
| मेष | 9 · 7 | 23 फ़र॰ 2028 | 8 अग॰ 2029 |
| वृषभ | 10 · 8 | 8 अग॰ 2029 | 5 अक्टू॰ 2029 |
| मेष | 9 · 7 | 5 अक्टू॰ 2029 | 17 अप्रैल 2030 |
| वृषभ | 10 · 8 | 17 अप्रैल 2030 | 30 मई 2032 |
| मिथुन | 11 · 9 | 30 मई 2032 | 12 जुल॰ 2034 |
| कर्क | 12 · 10 | 12 जुल॰ 2034 | 27 अग॰ 2036 |
| सिंह | 1 · 11 | 27 अग॰ 2036 | 29 सित॰ 2036 |
| राशि | लग्न · चंद्र से भाव | से | तक |
|---|---|---|---|
| कर्क | 12 · 10 | 30 सित॰ 2026 | 31 अक्टू॰ 2026 |
| सिंह | 1 · 11 | 31 अक्टू॰ 2026 | 24 जन॰ 2027 |
| कर्क | 12 · 10 | 24 जन॰ 2027 | 25 जून 2027 |
| सिंह | 1 · 11 | 25 जून 2027 | 26 नव॰ 2027 |
| कन्या | 2 · 12 | 26 नव॰ 2027 | 28 फ़र॰ 2028 |
| सिंह | 1 · 11 | 28 फ़र॰ 2028 | 24 जुल॰ 2028 |
| कन्या | 2 · 12 | 24 जुल॰ 2028 | 26 दिस॰ 2028 |
| तुला | 3 · 1 | 26 दिस॰ 2028 | 29 मार्च 2029 |
| कन्या | 2 · 12 | 29 मार्च 2029 | 24 अग॰ 2029 |
| तुला | 3 · 1 | 24 अग॰ 2029 | 24 जन॰ 2030 |
| वृश्चिक | 4 · 2 | 24 जन॰ 2030 | 1 मई 2030 |
| तुला | 3 · 1 | 1 मई 2030 | 22 सित॰ 2030 |
| वृश्चिक | 4 · 2 | 22 सित॰ 2030 | 17 फ़र॰ 2031 |
| धनु | 5 · 3 | 17 फ़र॰ 2031 | 13 जून 2031 |
| वृश्चिक | 4 · 2 | 13 जून 2031 | 15 अक्टू॰ 2031 |
| धनु | 5 · 3 | 15 अक्टू॰ 2031 | 5 मार्च 2032 |
| मकर | 6 · 4 | 5 मार्च 2032 | 12 अग॰ 2032 |
| धनु | 5 · 3 | 12 अग॰ 2032 | 23 अक्टू॰ 2032 |
| मकर | 6 · 4 | 23 अक्टू॰ 2032 | 17 मार्च 2033 |
| कुंभ | 7 · 5 | 17 मार्च 2033 | 28 मार्च 2034 |
| मीन | 8 · 6 | 28 मार्च 2034 | 6 अप्रैल 2035 |
| मेष | 9 · 7 | 6 अप्रैल 2035 | 14 अप्रैल 2036 |
| वृषभ | 10 · 8 | 14 अप्रैल 2036 | 9 सित॰ 2036 |
| मिथुन | 11 · 9 | 9 सित॰ 2036 | 29 सित॰ 2036 |
| राशि | लग्न · चंद्र से भाव | से | तक |
|---|---|---|---|
| कुंभ · सिंह | 7 · 5 / 1 · 11 | 30 सित॰ 2026 | 5 दिस॰ 2026 |
| मकर · कर्क | 6 · 4 / 12 · 10 | 5 दिस॰ 2026 | 23 जून 2028 |
| धनु · मिथुन | 5 · 3 / 11 · 9 | 23 जून 2028 | 10 जन॰ 2030 |
| वृश्चिक · वृषभ | 4 · 2 / 10 · 8 | 10 जन॰ 2030 | 31 जुल॰ 2031 |
| तुला · मेष | 3 · 1 / 9 · 7 | 31 जुल॰ 2031 | 16 फ़र॰ 2033 |
| कन्या · मीन | 2 · 12 / 8 · 6 | 16 फ़र॰ 2033 | 5 सित॰ 2034 |
| सिंह · कुंभ | 1 · 11 / 7 · 5 | 5 सित॰ 2034 | 24 मार्च 2036 |
| कर्क · मकर | 12 · 10 / 6 · 4 | 24 मार्च 2036 | 29 सित॰ 2036 |
| अवधि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | 24 जन॰ 2020 | 29 अप्रैल 2022 |
| ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | 12 जुल॰ 2022 | 17 जन॰ 2023 |
| ढैया (अष्टम शनि, चंद्र से आठवाँ) | ढैया (अष्टम शनि, चंद्र से आठवाँ) | 8 अग॰ 2029 | 5 अक्टू॰ 2029 |
| ढैया (अष्टम शनि, चंद्र से आठवाँ) | ढैया (अष्टम शनि, चंद्र से आठवाँ) | 17 अप्रैल 2030 | 30 मई 2032 |
| साढ़े साती | आरंभ (चंद्र से 12वाँ) | 22 अक्टू॰ 2038 | 5 अप्रैल 2039 |
| साढ़े साती | आरंभ (चंद्र से 12वाँ) | 12 जुल॰ 2039 | 27 जन॰ 2041 |
| साढ़े साती | शिखर (चंद्र पर) | 27 जन॰ 2041 | 6 फ़र॰ 2041 |
| साढ़े साती | आरंभ (चंद्र से 12वाँ) | 6 फ़र॰ 2041 | 26 सित॰ 2041 |
| साढ़े साती | शिखर (चंद्र पर) | 26 सित॰ 2041 | 11 दिस॰ 2043 |
| साढ़े साती | अंत (चंद्र से दूसरा) | 11 दिस॰ 2043 | 23 जून 2044 |
| साढ़े साती | शिखर (चंद्र पर) | 23 जून 2044 | 30 अग॰ 2044 |
| साढ़े साती | अंत (चंद्र से दूसरा) | 30 अग॰ 2044 | 7 दिस॰ 2046 |
| ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | 6 मार्च 2049 | 9 जुल॰ 2049 |
| ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | ढैया (कंटक शनि, चंद्र से चौथा) | 4 दिस॰ 2049 | 24 फ़र॰ 2052 |







